ऋषि चिंतन : वेदमूर्ति पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी का आलेख जानिए क्या है क्रोध का मूल
🌴।।२४ जून २०२५ मंगलवार।।🌴
//आषाढ़कृष्णपक्षचतुर्दशी२०८२ //
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‼️ऋषि चिंतन ‼️
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❗ अज्ञान ही क्रोध का मूल है❗
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👉 “क्रोध” एक भयंकर विषधर है। जिसने अपनी आस्तीन में इस साँप को पाल रखा है, उसका ईश्वर ही रक्षक है। एक प्राचीन नीतिकार का कथन है कि जिसने “क्रोध” की अग्नि अपने हृदय में प्रज्वलित कर रखी है, उसे चिता से क्या प्रयोजन?” अर्थात वह तो बिना चिता के ही जल जाएगा। ऐसी महाव्याधि से दूर रहना ही कल्याणकारी है. जिन्हें क्रोध की बीमारी नहीं है, उन्हें पहले से ही सावधान होकर इससे दूर रहना चाहिए और जो इस चुंगल में फँस चुके हैं, उन्हें पीछा छुड़ाने के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए।
👉 “क्रोध” की जड़ अज्ञान है। आदमी जब अपनी और दूसरों की स्थिति की बारे में गलत धारणा कर लेता है, तब उसे कुछ का कुछ दिखाई पड़ता है। बेटे ने आज्ञा नहीं मानी तो पिता को “क्रोध” आ गया क्योंकि पिता समझता है कि बेटा मेरी संपत्ति है, मेरी जायदाद है, मेर दास है, उसे आज्ञा माननी ही चाहिए। लेकिन क्रिया इससे जब उलटी होती है तो गुस्सा आता है। स्त्री ने आज बैगन का साग न बनाकर दाल बना ली। आपको गुस्सा आ रहा है कि उसने ऐसा क्यों किया ? मानो आप समझते हैं कि हर काम उसे आपकी आज्ञा से ही करना चाहिए। जिसे आप कुल में छोटा समझते हैं, वह ऊँची कुरसी पर बैठ जाता है तो आप आगबबूला हो जाते हैं। घर में कोई व्यक्ति आपसे बिना पूछे कोई काम कर डालता है, आप कुढ़ जाते हैं। कोई ग्राहक आपकी चीजों को खराब बताता है, आप उसे दस गालियाँ सुनाते हैं। आप वैष्णव हैं, कोई शैव होने की श्रेष्ठता बताता है तो आप उस पर बरस पड़ते हैं। किसी के विचार आपसे नहीं मिलते, वह मतभेद रखता है, बस आप उसे दुश्मन समझने लगते हैं। ‘लोगों को मेरी इच्छानुसार ही चलना चाहिए’ जब यह भावना गुप्त रूप से मन में घर कर लेती है, तब क्रोध का बीजारोपण होता है। पिल्लों को लड़ा-लड़ाकर जैसे कटखने स्वभाव का बना दिया जाता है और जैसे सिर चढ़ाने से बच्चा जिद्दी बन जाता है, उसी प्रकार ‘सब मेरे इच्छानुवर्ती हों’ की गुप्त भावना प्रतिकूल घटनाओं से टकरा-टकराकर बड़ी विकृत बन जाती है और मौके-बेमौके उग्र रूप धारण करके “क्रोध” की शकल में प्रकट होती है।
👉 इस मूल को काटे बिना क्रोध को नष्ट करना असंभव है। हमें प्रतिदिन एकांत में बैठकर कुछ देर शांतिपूर्वक अपनी वास्तविक स्थिति के बारे में सोचना चाहिए। हमें इतना अधिकार किसने दिया है कि अपने बिरानों को सब बात में अपनी इच्छानुसार चलावें ? हम स्वयं भी उतना ही अधिकार रखते हैं, जितना दूसरे। फिर जब आप दूसरे से प्रतिकूल विचार रखते हैं, दूसरों को वैसा करने का अधिकार क्यों नहीं है ? समझना चाहिए कि मैं स्वयं किसी से बड़ा या किसी का स्वामी. न होकर बराबर की स्थिति का हूँ। समाज का सारा काम समझौते के अनुसार चलता है, इसलिए जहाँ मतभेद होता है, वहाँ काम चलाऊ, समझौता कर लिया जाता है। रास्ते में आप और एक म्लेच्छ साथ-साथ जा रहे हैं तो आप उसका भोजन भले ही मत खाइए, पर रास्ता काटने के लिए साथ-साथ चलने का समझौता कर लेना बुद्धिमानी है। जिनसे आपके विचार नहीं मिलते उन पर “क्रोध” मत कीजिए, वरन जितना जरूरी हो, उतना सहयोग रखकर शेष बातों में असहयोग कर दीजिए। सबको विचार स्वातंत्र्य का अधिकार है। जो अपने को मालिक मानता है, कर्ता बनता है, अहंकार करता है, उसे ही “क्रोध” आवेगा। जो अपने केवल स्वरूप को जानता है, वह किसी पर क्रोध क्यों करेगा ?
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स्वस्थ और सुंदर बनने की विद्या पृष्ठ १९
🍁पं श्रीराम शर्मा आचार्य🍁
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