महाशिवरात्रि पर्व का क्या है विशेष महात्म्य, पढ़िए अखिलेश चमोला का आलेख

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​महाशिवरात्रि: शिवत्व के साक्षात्कार का महापर्व
​भारतीय संस्कृति में महाशिवरात्रि केवल एक व्रत या त्योहार नहीं है, बल्कि यह अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का एक आध्यात्मिक संकेत है। इस वर्ष 15 तारीख को आने वाली यह रात्रि, प्रकृति और पुरुष के मिलन का प्रतीक है, जो हमें स्वयं के भीतर झाँकने और अंतर्मन की अशुद्धियों को मिटाने का संदेश देती है।
​शिवरात्रि का आध्यात्मिक मर्म
​’शिव’ का अर्थ है कल्याण और ‘रात्रि’ का अर्थ है विश्राम। महाशिवरात्रि वह समय है जब जीव (आत्मा) का शिव (परमात्मा) से एकाकार होता है। शिवपुराण के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था, जो इस बात का प्रतीक है कि शक्ति के बिना शिव ‘शव’ समान हैं और शिव के बिना शक्ति का कोई अस्तित्व नहीं है।
​इस पर्व के प्रमुख स्तंभ
​जागरण का महत्व: यह केवल रात भर जागने के बारे में नहीं है, बल्कि अपनी चेतना को जगाने के बारे में है। बाहरी कोलाहल को शांत कर अंतरात्मा की आवाज़ सुनना ही वास्तविक जागरण है।
​वैराग्य और गृहस्थ का संतुलन: शिव एक ओर परम वैरागी हैं, तो दूसरी ओर आदर्श गृहस्थ। वे सिखाते हैं कि संसार में रहते हुए भी कैसे निर्लिप्त रहा जा सकता है।
​विषपान और करुणा: समुद्र मंथन के दौरान विष पीकर ‘नीलकंठ’ कहलाने वाले शिव हमें संदेश देते हैं कि बुराइयों को समाज में फैलने से पहले स्वयं पी लेना (धैर्य रखना) ही मानवता की सच्ची सेवा है।
​वैज्ञानिक दृष्टिकोण
​खगोलीय दृष्टि से, महाशिवरात्रि की रात पृथ्वी का उत्तरी गोलार्ध इस प्रकार स्थित होता है कि मनुष्य के भीतर की ऊर्जा प्राकृतिक रूप से ऊपर की ओर बढ़ती है। इसलिए, इस रात को रीढ़ की हड्डी सीधी रखकर (ध्यान मुद्रा में) बैठने का विशेष महत्व बताया गया है, ताकि ऊर्जा का ऊर्ध्वगामी प्रवाह आध्यात्मिक विकास में सहायक हो सके।
​उपसंहार
​महाशिवरात्रि का उपवास हमें इंद्रियों पर नियंत्रण करना सिखाता है, तो वहीं अभिषेक हमारे भीतर के प्रेम और समर्पण को दर्शाता है। इस 15 तारीख को, आइए हम केवल मंदिरों में ही शिव को न ढूंढें, बल्कि अपने भीतर के ‘सत्यं शिवं सुंदरम्’ को पहचानने का संकल्प लें।
​”आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं।”
(हे शिव, मेरी आत्मा आप हैं, मेरी बुद्धि पार्वती है और मेरा शरीर आपका मंदिर है।)
​लेखक,-डा अखिलेश चन्द्र चमोला,
देवभूमि उत्तराखंड श्रीनगर गढ़वाल।