ऋषि चिंतन: वेदमूर्ति पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी का आलेख

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🌴।।२२ जून २०२५ रविवार।।🌴
//आषाढ़कृष्णपक्ष द्वादशी २०८२ //
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‼️ऋषि चिंतन ‼️
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वैवाहिक जीवन संयमित जीवन
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👉 “नर” और “मादा” में लोहा-चुंबक का स्वाभाविक आकर्षण होने के कारण दोनों जोड़े से रहना पसंद करते हैं। जो पशु-पक्षी जितने ही विकसित होते जाते हैं, वे यौन-आकर्षण को अनुभव करते हैं और साथ-साथ रहते हैं। चकवा, सारस, कबूतर, तीतर, बतख, राजहंस आदि पक्षी और सिंह, हिरन, भेड़िया आदि पशु एवं साँप, मगर जैसे जीव-जंतु जोड़े से रहते हैं, जो नियमित जोड़ा चुनना नहीं जानता, वे भी समय-समय पर यौन-आकर्षण के अनुसार आकर्षित होते रहते हैं और विपरीत योनि के साथ रहना पसंद करते हैं। प्रजा की उत्पत्ति के कार्य को प्राणी भूल न जाए इसलिए प्रकृति ने उसमें एक विशेष आनंद का भी समावेश कर दिया है। इस प्रकार विकसित जीव-जंतु जोड़े से रहना चाहते हैं, तदनुसार मनुष्य भी चाहता है। इस आकर्षण को “प्रेम” के नाम से पुकारा जाता है। यही रस्सी नर और मादा को साथ-साथ रहने के लिए आपस में बाँधे रहती है। तरुण पुरुष विवाह की इच्छा करे तो यह उसका शारीरिक धर्म है, इसमें “हानि” कुछ नहीं “लाभ” ही है। प्राचीनकाल में शंकर जैसे योगेश्वर तथा वसिष्ठ, अत्रि, कपिल आदि योगी और ऋषि सपत्नीक रहते थे। आज जो भ्रम चल पड़ा है कि पत्नी के साथ रहकर मनुष्य “आत्मिक उन्नति” नहीं कर सकता, यह सर्वथा मिथ्या है। यदि ऐसी बात होती तो राजा जनक जिनसे अनेक योगी-मुनि आत्मज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने आते थे, गृहस्थ धर्म का परित्याग क्यों न कर देते ? जोड़े से रहना और प्राकृतिक धर्मों का पालन करना कुछ भी बुरा नहीं है। लोग समझते हैं कि हनुमान या भीष्म की तरह अखंड ब्रह्मचारी रहने से ही अधिक बल मिल सकता है। पर यह भी पूर्ण सत्य नहीं, क्योंकि यदि यही बात होती तो १०० पुत्रों के पिता धृतराष्ट्र क्या बुड्ढे होने पर भी भीम की लोहे की मूर्ति को पीस डालते ? और सोलह हजार स्त्रियों के पति कहे जाने वाले योगेश्वर कृष्ण इतने बलवान होते ?
👉 जोड़े से रहना बुरा नहीं है, परंतु प्रेम की स्वाभाविक शक्ति और गर्भाधान क्रिया के तात्कालिक आनंद; इन दोनों सात्विक वस्तुओं को जब हम कामवासना के बुरे रूप में परिणत कर देते हैं तो यह शरीर के लिए बहुत ही खतरनाक वस्तु बन जाती है। जैसे भूख स्वाभाविक है और मधुर भोजन करना भी स्वाभाविक है, किंतु इन प्राकृतिक क्रियाओं को विकृत करके जो मनुष्य चटोरा बन जाता है, दिन भर तरह तरह के भोजन का ही चिंतन करता है। थोड़ी-थोड़ी देर पर चाट पकौड़ी, मिठाई, खटाई चाटता रहता है, उसकी यह विकृत आदत ही उसके सर्वनाश का कारण बन जाती है। पेट खराब होने पर वह बीमार पड़ता है और शक्तिहीन होकर बहुत जल्द मर जाता है। इसी प्रकार यौन आकर्षण की स्वाभाविक क्रिया को जब कामाग्नि के रूप में परिणत कर दिया जाता है तो यह शरीर को जलाकर भस्म कर देती है। दिन भर पंखा चलाने वाली, रात भर रोशनी करने वाली, आपकी सब प्रकार का सुख देने वाली, बिजली भी जब अनुचित रीति से छू ली जाती है तो वह एक ही झटके में ही प्राण ले लेती है।
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स्वस्थ और सुंदर बनने की विद्या पृष्ठ ०७
🍁पं श्रीराम शर्मा आचार्य🍁
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