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उत्तराखंड के प्रख्यात ज्योतिष डॉक्टर अखिलेश चमोला का ज्ञान वर्धक लेख

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देवभूमि की पावन धरा से: मां दक्षिण काली के नवम स्वरूप का दिव्य आलोक
लेखक: डॉ. अखिलेश चन्द्र चमोला (मां दक्षिण काली कस्तूरी सदन, बाला वाला, देवभूमि उत्तराखण्ड)
​देवभूमि उत्तराखण्ड के तुषारावृत्त हिमशिखरों, पावन नदियों की कल-कल निनादिनी धाराओं और ऋषियों के तपोपूत वनों में शक्ति-तत्व कण-कण में स्पंदित है। इस दिव्य धरा पर शक्ति केवल एक उपासना पद्धति नहीं, अपितु जीवन और मोक्ष का आधारभूत संबल है। मां भगवती दक्षिण काली की साधना में उनका नवम स्वरूप परम सिद्धि, अज्ञान-विनाश और परा-चेतना के जागरण का प्रतीक माना जाता है।
​मां दक्षिण काली का यह पावन स्वरूप जीवन के द्वंद्वों—जन्म और मृत्यु, प्रकाश और अंधकार, भय और निर्भयता—से परे ले जाने वाली महाचेतना है। जहाँ सांसारिक दृष्टि उनके स्वरूप को संहारक मानती है, वहीं तत्ववेत्ता साधक जानते हैं कि मां का यह रूप वास्तव में अज्ञान, अहंकार और तामसिक प्रवृत्तियों का संहार कर अंतःकरण में विशुद्ध ज्ञान की ज्योति प्रज्वलित करता है।
​आध्यात्मिक एवं दार्शनिक मर्म
​दक्षिण दिशा और काल पर विजय: ‘दक्षिण’ यम की दिशा है, जो मृत्यु और भय का संकेत करती है। दक्षिण काली वह आद्याशक्ति हैं जो काल और मृत्यु के भय को भी हर लेती हैं। अपने साधकों के लिए मां दक्षिणा (उदार, कल्याणकारी) हैं, जो मृत्युंजय भाव प्रदान करती हैं।
​नवम स्वरूप और पूर्णता की सिद्धि: नवम अंक सनातन परंपरा में पूर्णता का सूचक है। मां का नवम विग्रह साधक की कुंडलिनी शक्ति के सहस्रार चक्र में महाशिव से मिलन की अंतिम परिणति है। यह स्वरूप समस्त भौतिक कामनाओं का शमन कर आत्मसाक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करता है।
​अभय और वरद मुद्रा: खड्ग और नरमुंड आसुरी प्रवृत्तियों के दलन का प्रतीक हैं, जबकि वरद और अभय मुद्राएं यह संदेश देती हैं कि जो शरण में आ गया, उसे संसार का कोई भय विचलित नहीं कर सकता।
​देवभूमि की चेतना में शक्ति साधना
​उत्तराखण्ड के सिद्धपीठों—चाहे वह मां धारी देवी का पावन धाम हो, कालिमठ का गुप्त शक्तिपीठ हो अथवा हरिद्वार का चंडी-मनसा-माया क्षेत्र—काली तत्व की अनुभूति यहाँ सहज ही हो जाती है। जब हिमालयी अंचलों में शंखध्वनि और घंटों के नाद के साथ मां का आह्वान होता है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो संपूर्ण चराचर जगत् उस जगज्जननी के वात्सल्य में लीन हो गया हो।
​नवम स्वरूप का पूजन हमें यह प्रेरणा देता है कि हम अपने भीतर छिपे काम, क्रोध, मद और मोह जैसे आंतरिक शत्रुओं का विसर्जन करें। संहार के बिना नव-सृजन संभव नहीं है; जब तक मन से विकारों का नाश नहीं होगा, तब तक भक्ति और ज्ञान का उदय संभव नहीं।
​प्रार्थना:
ॐ क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं स्वाहा।
हे महामाये! देवभूमि के समस्त संतानों सहित संपूर्ण सृष्टि पर अपनी करुणामयी दृष्टि बनाए रखें। अज्ञान का अंधकार मिटे और सबके जीवन में धर्म, सद्बुद्धि और शांति का सूर्य उदित हो।