पर्यावरण विद डॉक्टर आशुतोष पंत ने वन महकमे से किया बड़ा सवाल, लाखों पेड़ काटने पर जताई चिंता
प्रख्यात पर्यावरणविद् पूर्व जिला आयुर्वेदिक अधिकारी एवं अब तक 5 लाख से ज्यादा पौधे निशुल्क वितरित कर चुके डॉ आशुतोष पंत ने फायर लाइन के नाम पर वन विभाग द्वारा प्रस्तावित लाखों पेड़ों के कांटे जाने पर चिंता जताई है उन्होंने सवाल किया है कि जंगल बचाने के नाम पर लाखों पेड़ काट देने का औचित्य क्या है ? उन्होंने कहा कि समाचार पत्रों से मालूम पड़ा है कि जंगल की आग को रोकने के लिये नैनीताल वन प्रभाग के अधिकारियों ने दस हजार पेड़ों को काटने का फैसला लिया है। कहा जा रहा है कि नैनीताल वन प्रभाग की आठ रेंजों में 440 किलोमीटर फायर लाइन पर खड़े इन पेड़ों को काटकर जंगल में लगने वाली आग को रोका जा सकेगा। यह एक विडंबना है कि जंगल को आग से बचाने के लिए इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों को कुर्बान कर दिया जाएगा और यह केवल एक वन प्रभाग की बात है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार उत्तराखंड में कुल 44 वन प्रभाग हैं। इनमें से एक नैनीताल प्रभाग में जब दस हजार पेड़ काटे जाने हैं तो पूरे उत्तराखंड में कितने पेड़ काटे जाएंगे इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। क्या इस तरह लाखों पेड़ों को काट देना उचित है। ये लाखों पेड़ तो वह हैं जो एक निश्चित मोटाई से ज्यादा व्यास के हैं और पेड़ों की परिभाषा में आते हैं जिन्हें काटने के लिए न्यायालय से अनुमति ली गई है। इनके अलावा कितने लाखों पेड़ ऐसे भी कटेंगे जो अभी पेड़ के लिये निर्धारित परिभाषा में नहीं आते हैं, उनका आंकड़ा तो सार्वजनिक करने की जरूरत ही नहीं समझी जाती है वह तो गिनती में ही नहीं आते हैं।
क्या वनाग्नि को रोकने के लिये दूसरे उपाय नहीं खोजे जा सकते हैं। क्या कोई महामारी फैलने पर ऐसा किया जा सकता है कि बीमार लोगों को मार दिया जाय कि बीमारी आगे ना फैले। ये बेचारे पेड़ तो बीमार भी नहीं हैं।
जंगल में आग एक इलाके से दूसरी ओर ना फैले इसके लिये फायर लाइन काटी जाती हैं। आवश्यकतानुसार ये 3 मीटर से 12 मीटर तक चौड़ी हो सकती हैं। इन फायर लाइनों में झाड़ियों, सूखे पत्तों को बीच में इकट्ठा करके वन कर्मियों की देखरेख में जला दिया जाता है ताकि कभी आग लग जाए तो फायर लाइन में ईंधन ना मिलने से आग व्यापक रूप से आगे फैल ना पाए। कहा जा रहा है कि काफी समय से इन फायर लाइनों पर पेड़ उग आए हैं जिन्हें हटाये जाने की योजना है। इस बात से स्पष्ट है कि लंबे समय से इन फायर लाइनों की देखरेख और सफाई नहीं हुई होगी अन्यथा ये पेड़ पहले ही हटा दिए गए होते और ये नौबत ना आती कि पेड़ इतने बड़े हो जाएं कि उन्हें काटने के लिए अदालत से इजाजत लेनी पड़ती।
एक ओर सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश हैं कि पराली या कोई भी कृषि में बचे उत्पाद जलाये ना जाएं। यहां तक कि ऐसा करने पर भारी जुर्माने का भी प्रावधान है। दूसरी ओर वन विभाग आज भी अंग्रेजों के जमाने की तरकीबों पर निर्भर है। आज भी लकीर के फकीर की तरह पुराने तरीकों का पालन किया जा रहा है। हर साल सभी वन प्रभागों में कंट्रोल बर्निंग की जाती है। यह भी फायर लाइन जैसी प्रक्रिया है। इसमें सूखे पत्ते, झाड़ियों को जला दिया जाता है जिससे किसी कारण यदि आग लग जाय तो वह ज्यादा क्षेत्र में ना फैले। क्या यह न्यायालय के आदेशों की अवमानना नहीं है। इससे कितना वायु प्रदूषण होता है। भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और अन्य विषैली गैसें वातावरण को दूषित करती हैं। उत्तराखंड राज्य के देहरादून में देश का जाना माना वन अनुसंधान केंद्र (एफ आर आई) है हमारे वैज्ञानिकों को अन्य उपायों पर विचार करना चाहिये कि वनाग्नि पर कैसे नियंत्रण किया जाए।
बहुत पहले मैंने पढ़ा था कि इटली में राष्ट्रीय राजमार्ग बनाते समय सिनकोना का एक बड़ा पेड़ बीच में आ रहा था उसे काटने के बजाय वहां सड़क को इस तरह घुमाकर बनाया गया कि पेड़ बच गया। हमारे यहां तो पेड़ों को कुछ समझा ही नहीं जाता है विकास के नाम पर लाखों पेड़ काट दिए जाते हैं कोई इनके बारे में सोचता तक नहीं है कि इनमें भी जीवन है और ये ही हमारे जीवन का आधार हैं।
दूसरे देशों में लोग इतने संवेदनशील हो सकते हैं कि एक पेड़ के लिये रोड को ही घुमाकर बना देते हैं तो क्या हम अपने जंगल में फायर लाइन को पेड़ों को बचाते हुए घुमाकर नहीं बना सकते हैं। और क्या यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि पेड़ों को काटकर फायर लाइन बनाने के बाद आग नहीं लगेगी और बिल्कुल नहीं फैलेगी।
चीड़ की पत्तियां जिन्हें पिरूल कहा जाता है वह हों, साल, सागौन के पत्ते हों या दूसरे पर्णपाती पेड़ों के पत्ते हों वह लगातार गिरते रहते हैं। एक बार फायर लाइन को साफ कर देने से हमें आश्वस्त नहीं हो जाना चाहिए़ कि पूरे फायर सीजन में आग से बचाव हो जाएगा। जंगल की आग को तब तक नहीं रोका जा सकता जब तक लगातार गिरे हुए पत्तों को ना हटाया जाय जो ज्वलनशील होते हैं और जंगल की आग के लिए ईंधन का काम करते हैं।
जंगलों में आग कभी अपने आप नहीं लगती है। 99.99 % मामलों में यह आदमियों द्वारा लगाई जाती है। वन माफिया अपनी चोरी को छिपाने के लिए आग लगाते हैं। ग्रामीण अच्छी घास उगेगी ऐसी धारणा के कारण घास को जलाते हैं जो बढ़कर फैल जाती है। कुछ लोगों द्वारा लापरवाही से जलते बीड़ी सिगरेट के टुकड़े फेंक देने से भी आग लगती है। डॉक्टर पंत ने कहा कि उनका
सुझाव है कि व्यापक स्तर पर जनजागरूकता कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए़। वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को कर्तव्यबोध कराया जाय ताकि वह आग की सूचना मिलने पर तत्परता से प्रयास करें। प्रदेश के वन मंत्री श्री सुबोध उनियाल वैज्ञानिक सोच वाले व्यक्ति हैं उनकी पहल है कि फायर फाइटिंग के लिये आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित हो सके इसके लिए वह प्रयास भी कर रहे हैं। अब तो वन विभाग के पास ब्लोअर आदि भी उपलब्ध हैं तो बजाय पत्ते जलाने के उन्हें इकट्ठा करके फायर गैप बनाया जाय ताकि आग फैलने ना पाए। जनसहभागिता बढ़ाकर जंगलों को बचाया जा सकता है। कंट्रोल बर्निंग के बजाय स्थानीय लोगों को पिरूल और सूखे पत्ते इकठ्ठा करके ले जाने की इजाज़त देकर फायर लाइनों को साफ रखा जा सकता है। यह पिरूल और सूखे पत्ते, गिरी हुई टहनियां ग्रामीणों के काम आ सकती हैं।
उत्तराखंड सरकार ने 50 रुपए किलो में पिरूल खरीदने का फैसला किया था जो ठीक तरह से लागू किया जाय तो वनाग्नी रोकने के लिए कारगर उपाय हो सकता है। हालांकि उनकी व्यक्तिगत राय है 50 रुपए किलो कीमत कुछ ज्यादा है। पिरूल और दूसरे सूखे पत्ते वाजिब कीमत पर खरीद कर कॉम्पेक्टर मशीन से बंडल बनाकर वन निगम द्वारा ऐसे कारखानों को बेचा जा सकता है जहां कोयला आदि ईंधन इस्तेमाल होता है।
गढ़वाल और कुमाऊं मंडल में एक एक बहुउद्देशीय हेलीकॉप्टर रखे जा सकते हैं जो जंगल की आग बुझाने, एयर एम्बुलेंस की तरह और प्राकृतिक आपदा के समय लोगों को एयर लिफ्ट करने के काम आयेंगे। अन्य भी बहुत से उपाय हो सकते हैं जिनपर मंथन की आवश्यकता है। मेरा वन मंत्री जी और वन विभाग के उच्चाधिकारियों से अनुरोध है इस विषय में हस्तक्षेप करके इन लाखों पेड़ों को कटने से बचाएं।
डॉ आशुतोष पन्त
पूर्व जिला आयुर्वेद अधिकारी/पर्यावरणविद।
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