आज से खरमास शुरू, इस महीने में क्यों नहीं होते हैं मांगलिक कार्य बता रहे हैं आचार्य प्रकाश बहुगुणा
खरमास लग गया है
इसमें शुभ कार्य वर्जित होता है, यह केवल अंधविश्वास नहीं है। खरमास ( जिसे मलमास या पौष मास की संक्रान्ति परम्परा से जोड़ा जाता है ) को लेकर समाज में जो “शुभ कार्य वर्जित” की धारणा है, वह केवल अंधविश्वास नहीं है, बल्कि इसके पीछे ज्योतिषीय, पौराणिक और सांस्कृतिक, तीनों स्तरों पर एक संगठित तर्क उपस्थित है। किंतु इस तर्क को शास्त्र की दृष्टि से समझे बिना केवल निषेध को पकड़ लेना स्वयं शास्त्रसम्मत नहीं माना गया है। ज्योतिष के अनुसार जब सूर्य धनु राशि में प्रवेश करता है, तब वह गुरु की राशि में स्थित होता है। गुरु को विवाह, संस्कार, धर्म, वृद्धि और मंगल कार्यों का कारक ग्रह माना गया है। सूर्य जब गुरु की राशि में आता है, तो परम्परागत ज्योतिष में इसे “गुरु का तेज आच्छादित होना” या “गुरु का अप्रत्यक्ष रूप से अस्त होना” कहा गया है। फलस्वरूप विवाह, उपनयन, गृहप्रवेश जैसे संस्कार, जो गुरु तत्त्व पर आधारित हैं, उनकी स्वाभाविक अनुकूलता कम मानी जाती है। इसी कारण धर्मशास्त्रों में यह काल संस्कारों के लिए अनुपयुक्त बताया गया। एक अन्य दृष्टि से देखें तो खरमास वह काल है जब सूर्य दक्षिणायन की ओर गतिशील होता है और पौष के आसपास उसकी गति अपेक्षाकृत मंद मानी जाती है।
सूर्य को कालचक्र, प्राणशक्ति और सक्रियता का स्रोत माना गया है। जब सूर्य की गति मंद मानी जाती है, तब बाह्य कर्मकाण्ड की अपेक्षा अंतर्मुखी साधना, तप, जप, दान और संयम को प्रधानता दी जाती है। यही कारण है कि इस अवधि में तीर्थ स्नान, व्रत, दान और जप को अत्यंत पुण्यदायी कहा गया है, जबकि सामाजिक वैभव से जुड़े मंगल कर्म स्थगित रखे जाते हैं। अब प्रश्न यह है कि यदि इस काल में शुभ कार्य कर लिया जाए तो क्या कोई अनिष्ट अवश्यंभावी है? ज्योतिष शास्त्र इसका उत्तर अत्यंत संतुलित ढंग से देता है। शास्त्र यह नहीं कहते कि खरमास में विवाह या गृहप्रवेश करने से अनिवार्य रूप से विपत्ति आएगी। बल्कि यह कहा गया है कि उस समय ग्रहों की सामूहिक अनुकूलता सामान्यतः कम होती है, इसलिए अपेक्षित सहजता, स्थायित्व और सौम्यता प्राप्त करने में बाधा आ सकती है। यह “निषेध” दैवी दंड का भय नहीं, बल्कि काल-चयन की विवेकपूर्ण सावधानी है।
इसी कारण अपवाद भी स्वीकार किए गए हैं। यदि किसी व्यक्ति की जन्मकुण्डली में गुरु अत्यंत बलवान हो, शुभ दृष्टियों से युक्त हो, और अन्य ग्रह भी अनुकूल हों, तो खरमास में किया गया कार्य निष्फल नहीं माना जाता। आपातकाल, आजीविका, चिकित्सा, शिक्षा, गृह निर्माण जैसे व्यावहारिक कार्यों पर इस निषेध का कोई कठोर प्रभाव नहीं माना गया है। स्वयं धर्मशास्त्र कहते हैं कि आपद्धर्मो बलवान्
अर्थात् आपत्ति और अनिवार्यता में नियम शिथिल हो जाते हैं। खरमास में शुभ कार्यों का वर्जन कोई अंध निषेध नहीं, बल्कि काल-तत्त्व और ग्रह-तत्त्व की संगति पर आधारित एक सांस्कृतिक अनुशासन है। इसका उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि जीवन में लय और संतुलन बनाए रखना है। यदि कोई श्रद्धा और परम्परा से इस काल में संयम बरतता है, तो वह भी शास्त्रसम्मत है और यदि किसी विवशता या कुंडलीगत अनुकूलता के कारण इस अवधि में कार्य करता है, तो उसे पाप या अनिष्ट का भागी मान लेना भी ज्योतिष का निष्कर्ष नहीं है।
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