जानिए क्या है अनुभूति

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जानिए क्या है अनुभूति पूर्व अपर सचिव जीवन चंद्र उप्रेती के शब्दों में

पंचतत्व से बने शरीर में परमात्मा का परम अंश प्रवेश होते ही चेतना का उदय होता है। और यह अंश जीव आत्मा कहलाती है ।चेतना के कारण बुद्धि और मन के योग से निरंतर क्रियाओं में व्यक्ति लिप्त हो जाता है ।भौतिक जगत से प्रभावित तथा माया के भ्रम से युक्त मन को यह विस्मरण हो जाता है कि उसके अंदर प्रविष्टि चेतन शक्ति उसे परमात्मा का रूप है, जो विराट ,सर्वव्यापी, परमनिश्चल ,अविनाशी ,निराकार एवं परम आनंद अनुभूति कारक है।

यह शुद्ध आत्मा शरीर बंधन में पड़कर अपना अस्तित्व खो देती है और शरीर बोध के कारण नाना प्रकार के कृतियों में लिप्त हो जाती है ,जो क्षणिक आनंद पूर्ण है ।और जिस कारण व्यक्ति कर्म बंधन के माया जाल में फसता चला जाता है।
उदाहरण के तौर पर प्रेम को देखा जाए तो व्यापक प्रेम को ना समझ व्यक्ति शरीर बोध के कारण ही संकुचित प्यार में लिप्त रहता है ।आत्मा से किया गया प्रेम शरीर बोध रहित होता है ।यह प्यार उसी प्रकार है जैसे एक मां अपने बच्चों से करती है, जिसमें कोई शर्त नहीं होती है ,जो अनकंडीशनल लव है ।और इसमें ही बच्चों के सुख में उसे परम आनंद की अनुभूति होती है।
शरीर बोध का प्यार स्वार्थ परक है ।आत्मा का प्रेम वह सत्य प्रेम है ,जिसमें स्वार्थ का नामोनिशान नहीं होता है ।शरीर बोध का ज्ञान नहीं होता है ,जो कर्तव्य परायणता या जबरन दिखाने के रूप में नहीं किया जा सकता है। यह प्रेम तो सच्चा प्रेमी ही कर सकता है जैसे योगी ऐसे प्रेम में परम आनंद की अनुभूति करते हैं ,जो एक स्थाई आनंद है।
निष्काम प्रेम जो इच्छाओं से परे हैं ,सुंदर भक्ति का रूप ही है ।ऐसे प्रेम में समर्पण प्रबल होता है समर्पण भाव का होना ही आत्मज्ञान का प्रथम सोपान है। आत्मज्ञान अथवा आत्म दर्शन ही मस्तिष्क को स्वच्छ बनता है और उसे उच्च आनंद पूर्ण अनुभूति के लिए तैयार करता है। ऐसे समर्पण भाव में बिना किसी शर्त के ईश्वर अथवा प्रकृति के दर्शन होता है ,और प्रेमी स्वयं को समझते हुए आनंद में रहता है ।ऐसा प्रेम आंतरिक शांति का कारण बनता है। और प्रेमी सर्वत्र प्रेम के दर्शन करता है। वह बिना किसी अपेक्षा के प्रेम को ही खोजता है और प्रेम में ही जीता हुआ परम आनंद की अनुभूति करता है।
ऐसा प्रेमी कुछ भी नहीं करना चाहता है ,जिससे वह प्रेम करने वाले से दूर रहे ।वह प्रेम करने में इतना तल्लीन रहता है कि उसे शरीर बोध भी नहीं रहता है ।वह किसी बात विवाद तर्कों में नहीं पड़ना चाहता है ।वह तो आध्यात्मिक व्यवस्था के अनुकूल जीता है ।और इस व्यवस्था में रहकर परम आनंद की अनुभूतिकरता है।
यह सत्य है कि जीवन बिना समर्पण भाव एवं प्रेम के इस प्रकार है जैसे बिना पानी के घड़ा। ऐसा जीवन परम आनंद के अनुभूति में सदैव असफल ही रहता है ।और मोक्ष की ओर उन्मुक्त न होकर कर्म बंधन में फंसा रहता है।

लेखक पूर्व अपर सचिव लोकायुक्त है तथा पर्वतीय महासभा के केंद्रीय अध्यक्ष एवं भारत की लोक जिम्मेदार पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है
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