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भक्तों के हृदय में है मां दक्षिण काली का निवास: अखिलेश चमोला

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मां दक्षिण काली बसती है, भक्तों के हृदय में
लेखक: अखिलेश चन्द्र चमोला, देवभूमि उत्तराखण्ड
​भारतीय सनातन परंपरा में शक्ति साधना का केंद्र सदैव मातृभाव रहा है। जगज्जननी भगवती के विविध रूपों में ‘मां दक्षिण काली’ का स्वरूप अत्यंत रहस्यमयी, जाग्रत और पारलौकिक कृपा से परिपूर्ण है। सामान्य दृष्टि में मां का रूप भले ही संहारक, विकराल और उग्र प्रतीत होता हो, किंतु अंतर्दृष्टि से देखने वाले साधक और भक्त के लिए वे अनंत करुणा, वात्सल्य और मोक्ष प्रदायिनी मां हैं। मां दक्षिण काली केवल काष्ठ, पाषाण या विग्रह तक सीमित नहीं हैं, वे तो निष्काम प्रेम और समर्पण रखने वाले अपने हर भक्त के हृदय में स्पंदित होती हैं।
​उग्र स्वरूप में छिपा परम वात्सल्य
​मां दक्षिण काली का दक्षिणाभिमुख स्वरूप संहार और निर्माण के संतुलन का प्रतीक है। दाहिना पैर आगे बढ़ाए मां काल के प्रभाव को भी अपने वश में कर लेती हैं, इसलिए वे कालजयी हैं। गले में मुंडमाला अहंकार के विनाश का संदेश देती है, तो वरद और अभय मुद्रा भक्त को निर्भय होकर जीवन जीने की प्रेरणा देती है।
​अखिलेश चन्द्र चमोला जी के वैचारिक दृष्टिकोण से देखें, तो मां का यह रौद्र रूप दुष्ट प्रवृत्तियों और आंतरिक विकारों—काम, क्रोध, मद, मोह—के संहार के लिए है। अपने अबोध संतान रूपी भक्त के लिए मां का हृदय गंगा के जल की भांति निर्मल और वात्सल्य से परिपूर्ण है। जिस प्रकार एक मां अपनी संतान की रक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जा सकती है, उसी प्रकार दक्षिण काली अपने शरणागत के समस्त संकट हर लेती हैं।
​देवभूमि उत्तराखण्ड की आध्यात्मिक चेतना और शक्ति तत्व
​देवभूमि उत्तराखण्ड केवल हिमालय के हिमशिखरों की भूमि नहीं, बल्कि आदि पराशक्ति की तपोस्थली है। यहां के कण-कण में देवी तत्व की गूंज है। हरिद्वार में नील पर्वत की तलहटी में स्थित सिद्धपीठ मां दक्षिण काली मंदिर इसका जीवंत प्रमाण है। गंगा की कलकल ध्वनि के मध्य स्थापित यह पीठ सदियों से सिद्ध संतों और सामान्य श्रद्धालुओं को आंतरिक शांति और शक्ति प्रदान करता आ रहा है।
​पहाड़ों की पावन घाटी, देवदार के वन और शीतल बयार के बीच जब साधक एकाग्रचित्त होकर भगवती का स्मरण करता है, तो मंदिर की चारदीवारी गौण हो जाती है; साधक के अंतर्मन का मंदिर ही मां का साक्षात धाम बन जाता है।
​हृदय ही मां का वास्तविक वास
​तांत्रिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हृदय चक्र (अनाहत चक्र) में ही शक्ति का सूक्ष्म रूप विद्यमान है। जब भक्ति में पाखंड, भय या भौतिक लालसा का स्थान नहीं रहता, तब साधक का अंतःकरण निष्कलुष हो जाता है। इसी पवित्र हृदय में मां दक्षिण काली का वास होता है।
​मां को प्रसन्न करने के लिए किसी आडंबर की आवश्यकता नहीं, केवल शुद्ध भाव और अनन्य समर्पण ही पर्याप्त है। जो भक्त अपने अहंकार को मां के चरणों में अर्पित कर देता है, उसके अंतर्मन में ज्ञान का प्रकाश फूट पड़ता है और वह प्रत्यक्ष अनुभव करता है कि जगदंबा पल-पल उसकी रक्षा कर रही हैं।
​मां दक्षिण काली जीवन की अस्थिरता के बीच परम संबल हैं। वे अंधकार को चीरकर निकलने वाले उस प्रकाश की भांति हैं, जो अज्ञान का तिमिर मिटाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। लेखक अखिलेश चन्द्र चमोला जी का यह चिंतन हमें इसी शाश्वत सत्य की ओर ले जाता है कि ईश्वर की सच्ची खोज बाह्य जगत में नहीं, बल्कि अंतरात्मा की गहराइयों में है। जब भक्त का प्रेम प्रगाढ़ होता है, तब मां दक्षिण काली वास्तव में उसके हृदय-कमल पर विराजती हैं।