बसंत पंचमी का पावन पर्व कल, पढ़िए डॉक्टरअखिलेश चमोला का आलेख
सौन्दर्य और प्रेम का प्रतीक: बसन्त पंचमी
लेखक: डॉ. अखिलेश चन्द्र चमोला
भारतवर्ष की पावन धरा को ‘ऋतुओं का देश’ कहा जाता है। यहाँ ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर ऋतुओं की अपनी अनुपम छटा है, किंतु इन सबमें ‘बसन्त’ का स्थान सर्वोपरि है। इसीलिए शास्त्रों में इसे ‘ऋतुराज’ (ऋतुओं का राजा) की संज्ञा दी गई है।
प्रकृति का नव-श्रृंगार और आगमन
शास्त्रों के अनुसार, बसन्त वह काल है जब न केवल मानवीय जगत, बल्कि प्रकृति प्रदत्त जड़-चेतन, वृक्ष और लताएं भी आनंद से झूम उठते हैं। इस ऋतु का पदचाप माघ मास में सुनाई देने लगता है और चैत्र-वैशाख तक यह अपने पूर्ण यौवन पर होती है। माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को हम ‘बसन्त पंचमी’ के रूप में मनाते हैं, जो प्रकृति के पुनर्जन्म का उत्सव है।
ज्ञान की अधिष्ठात्री: माँ सरस्वती का प्राकट्य
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन तिथि को विद्या, बुद्धि और संगीत की देवी माँ सरस्वती का प्राकट्य हुआ था।

अज्ञान का निवारण: माँ सरस्वती की पूजा से हृदय का अंधकार दूर होता है और मन ज्ञान की रश्मियों से अभिसिंचित होने लगता है।
अध्यात्मिक शक्ति: इस दिन माँ सरस्वती की प्रतिमा के सम्मुख ‘ॐ ह्लीं ऐं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः’ मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करने से अलौकिक शांति प्राप्त होती है। यह साधना मनुष्य के आत्मविश्वास को इतना सुदृढ़ कर देती है कि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उसका मन नहीं डगमगाता।
शुभ मुहूर्त (वर्ष 2026): इस वर्ष यह पुनीत पर्व 23 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा। पूजा का विशेष शुभ समय प्रातः 7:15 बजे से दोपहर 12:33 बजे तक रहेगा।
पीत वर्ण का महत्व: सुख और समृद्धि
बसन्त पंचमी के दिन पीले रंग का विशेष महत्व है। पीला रंग ऊर्जा, उत्साह और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
पूजा विधान: इस दिन पीले वस्त्र धारण करने और हल्दी का तिलक लगाने का विधान है।
प्राकृतिक दृश्य: खेतों में लहलहाती पीली सरसों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो धरती माता ने स्वयं ‘पीली चुनर’ ओढ़ ली हो। फूलों पर आती बहार और आम्र-मंजरियों की महक चहुंओर मादकता भर देती है।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गौरव
इसे ‘ऋषि पंचमी’ के नाम से भी जाना जाता है। ज्योतिष शास्त्र में इसे ‘अबूझ मुहूर्त’ माना गया है, अर्थात किसी भी शुभ कार्य को करने के लिए इस दिन पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं होती; यह दिन अपने आप में सिद्ध है।
इस पर्व का ऐतिहासिक महत्व भी कम नहीं है:
साहित्यिक योगदान: इसी दिन प्रगतिवादी काव्य धारा के स्तंभ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी का जन्म हुआ था।
शौर्य की गाथा: यह पर्व वीर बालक हकीकत राय के बलिदान की भी स्मृति दिलाता है, जिन्होंने अपने धर्म की रक्षा हेतु प्राण न्यौछावर कर दिए।
विद्वानों की दृष्टि: महाकवि कालिदास ने इसे ‘ऋतु उत्सव’ कहा है, तो आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसे ‘मादक उत्सवों का काल’ माना है।
वास्तव में, बसन्त पंचमी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि जीवन में नवीनता, प्रेम और सौंदर्य के संचार का उत्सव है। जब मंद पवन चलती है और प्रकृति का कण-कण नृत्य करने लगता है, तब पृथ्वी पर ही ‘स्वर्ग’ की अनुभूति होने लगती है। यह पर्व हमें संदेश देता है कि हम अपने जीवन को ज्ञान से आलोकित करें और प्रकृति के संरक्षण का संकल्प लें।
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