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शक्ति की अधिष्ठात्री मां दक्षिण काली: अखिलेश चमोला

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शक्ति की अधिष्ठात्री माँ दक्षिण काली: देवभूमि की पावन चेतना और आध्यात्मिक स्वरूप
​आलेख रचना: अखिलेश चन्द्र चमोला (देवभूमि उत्तराखण्ड)
​देवभूमि उत्तराखण्ड अनादि काल से ऋषियों की तपोस्थली, योगियों की साधना-भूमि और साक्षात् पराशक्ति के प्राकट्य का केंद्र रही है। हिमालय के उत्तुंग शिखरों से लेकर कल-कल बहती पतित-पावनी गंगा के तटों तक, इस धरा का प्रत्येक कण ईश्वरीय स्पंदन से परिपूर्ण है। इसी देवधरा पर शक्ति-उपासना की समृद्ध परंपरा में माँ दक्षिण काली का स्वरूप अगाध श्रद्धा, तंत्र-साधना, और भक्तों के अभय-कल्याण का शाश्वत स्रोत है।
​माँ दक्षिण काली: नाम और तात्विक मर्म
​सनातन तंत्र दर्शन और शाक्त परंपरा में माँ काली के विभिन्न रूपों में ‘दक्षिण काली’ को सर्वोपरि माना गया है। इनके नाम के पीछे कई गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य समाहित हैं:
​दक्षिण पद का रहस्य: जब माँ भगवती का दक्षिण (दायां) चरण भगवान शिव के वक्षस्थल पर स्थापित होता है, तब वह स्वरूप ‘दक्षिण काली’ कहलाता है। दायां पैर अनुकूलता, कृपा, और मोक्षदायिनी शक्ति का प्रतीक है, जो साधक को भयमुक्त कर शीघ्र फल प्रदान करता है।
​यमराज (दक्षिण दिशा के स्वामी) का भय-हरण: दक्षिण दिशा यम की दिशा मानी जाती है, जो मृत्यु और काल का द्योतक है। माँ काली स्वयं ‘काल’ को भी वश में करने वाली ‘महाकाल-प्रिया’ हैं। जो भक्त माँ दक्षिण काली की शरण में आते हैं, माँ उन्हें अकाल मृत्यु और यम-दण्ड के भय से सर्वथा मुक्त कर देती हैं।
​दक्षिणा मूर्ति और सुलभ कृपा: तंत्र शास्त्रों के अनुसार, दक्षिण मुख होकर साधना करने वाले साधकों पर माँ की कृपा बिना किसी विलंब के बरसती है। यह स्वरूप संहारक होते हुए भी भक्त के प्रति मातृत्व और करुणा से ओतप्रोत है।
​देवभूमि उत्तराखण्ड में माँ काली की आध्यात्मिक पीठ
​उत्तराखण्ड शक्तिपीठों और सिद्धपीठों का गढ़ है। यहाँ माँ काली के विभिन्न सिद्धपीठ स्थित हैं, जहाँ माँ दक्षिण काली और महाकाली की आराधना सदियों से निरंतर चल रही है:
​हरिद्वार स्थित दक्षिण काली मंदिर: गंगा के तट पर चंडी देवी और मनसा देवी के सान्निध्य में स्थापित सिद्धपीठ दक्षिण काली मंदिर साधना का मुख्य केंद्र है। इस सिद्धपीठ की स्थापना और तंत्र साधना परंपरा में महान तपस्वियों (जैसे बाबा कामराज जी) का विशेष योगदान रहा है। यहाँ गंगा की धारा और माँ काली की ऊर्जा मिलकर एक अद्वितीय आध्यात्मिक वातावरण निर्मित करती हैं।
​कालीमठ सिद्धपीठ (रुद्रप्रयाग): केदारघाटी में सरस्वती नदी के तट पर स्थित कालीमठ वह दिव्य स्थल है जहाँ माँ ने शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज का संहार किया था। यहाँ कोई मूर्ति नहीं, बल्कि एक पावन शिला और कुंड की पूजा होती है, जो साक्षात् महाकाली की जाग्रत ऊर्जा का प्रतीक है।
​हाट कालिका (गंगोलीहाट, पिथौरागढ़): कुमाऊं मंडल में स्थित यह सिद्धपीठ आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा शक्ति-कीलित पीठ है, जहाँ माँ कालिका अपने जाग्रत स्वरूप में सैन्य बलों और जनसामान्य की रक्षक मानी जाती हैं।
​माँ का स्वरूप: संहारक आवरण में असीम वात्सल्य
​माँ दक्षिण काली का स्वरूप बाहर से जितना उग्र और विकराल प्रतीत होता है, भीतर से वह उतना ही वात्सल्यमयी और कल्याणकारी है:
​नील-श्याम वर्ण: माँ का गहरा कृष्ण वर्ण अनंत आकाश और उस निराकार ब्रह्म का प्रतीक है, जिसमें सृष्टि के समस्त रंग और तत्व विलीन हो जाते हैं।
​मुण्डमाला व खड्ग: माँ के गले में पचास मुण्डों की माला वर्णमाला के पचास अक्षरों (नादब्रह्म) और मनुष्य के मिथ्या अहंकार के विसर्जन की परिचायक है। हाथ में खड्ग अज्ञान और मोह-पाश को काटने का ज्ञान-अस्त्र है।
​अभय और वरद मुद्रा: एक ओर जहाँ माँ के हाथों में संहारक अस्त्र हैं, वहीं दूसरी ओर उनके कर-कमल अभय और वरदान की मुद्रा में हैं, जो अपने शरणागत बच्चों को आश्वासन देते हैं कि “डरो मत, मैं तुम्हारी रक्षक हूँ।”
​समकालीन जीवन में प्रासंगिकता
​वर्तमान युग में जब मानव मन अशांति, भय, मानसिक अवसाद, और अनिश्चितता से घिरा हुआ है, तब माँ दक्षिण काली की उपासना भीतर के तम (अंधकार) को मिटाने का सबसे सशक्त माध्यम है। माँ केवल बाह्य शत्रुओं का नाश नहीं करतीं, बल्कि साधक के अंतःकरण में छिपे काम, क्रोध, लोभ, और संशय रूपी आसुरी प्रवृत्तियों का शमन कर आत्मबल और प्रज्ञा का संचार करती हैं।
​देवभूमि उत्तराखण्ड के आध्यात्मिक शिखर से निकलकर माँ दक्षिण काली की कृपा-गंगा प्रत्येक उस हृदय को पावन करती है, जो समर्पण भाव से उनके चरणों में शीश नवाता है। वह प्रकृति हैं, पराशक्ति हैं और अंततः मोक्षदायिनी जगदम्बा हैं।

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लेखक अखिलेश चमोला राज्यपाल पुरस्कार से सम्मानित हैं

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