श्राद्ध पक्ष का महत्व समझा रहे हैं आचार्य प्रकाश बहुगुणा
।। श्राद्धपक्ष पितृपक्ष ।।
मानवता की पोषक भारतीय संस्कृति धरती के सभी प्राणियों के योग क्षेम की चिंता करती है। इसकी सिद्ध के लिए मानव को साधक बनाकर पंचयज्ञों का विधान किया गया है जिसमें चेतन ही नहीं जड़ पदार्थों का भी ध्यान रखा गया है। मनुष्य पर जन्म से ही देव, ऋषि, पितृ आदि पांच ऋणों का भार होता है। पंचयज्ञ इनसे मुक्ति के साधन हैं। इनमें पितृयज्ञ पितृऋण से मुक्ति का उपाय है। वेदों ने माता पिता के आदर सम्मान एवं सेवा के लिए मातृदेवो भव, पितृदेवो भव का उदघोष किया है इसी भावना की सिद्धि हेतु भारतीय संस्कृति में पितृपक्ष का विधान है, जिसमें श्राद्ध कर्म द्वारा उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है। श्रद्धा भाव प्रमुख होने से इसे श्राद्ध कहते हैं। श्रद्धा से समर्पित भोगों को पूर्वज भाव रूप में ग्रहण करते हैं।
*ॐ सर्वेभ्यो पितृभ्यो नम:*
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