पहाड़ के जंगलों में धधकती आग का एक कारण बढ़ा रहे हैं डॉ आशुतोष पंत
जंगल में आग लगाना अपराध के साथ साथ घोर पाप है।
आग लगाने से बरसात में अच्छी घास उगेगी यह धारणा बिल्कुल आधारहीन है।
हर साल लाखों पेड़ और पशु पक्षी जंगल की आग में भस्म हो जाते हैं। इसमें करोड़ों की वन संपदा का तो नुकसान होता ही है पारिस्थितिक तंत्र बुरी तरह लड़खड़ा जाता है। वनाग्नि के बहुत से कारण हैं जिनमें एक मुख्य कारण है वन माफियाओं द्वारा अपनी चोरी को छिपाने का प्रयास। ये पेड़ों की चोरी करते हैं बाद में सबूत मिटाने के लिए आग लगा देते हैं। पिछले कुछ वर्षों में अराजक तत्वों द्वारा जंगलों में आग लगाने की घटनाएं भी देखी गई हैं। ये वही देश विरोधी लोग हैं जो कहीं रेल की पटरियों को क्षतिग्रस्त करते हैं, कहीं बिजली के ट्रांसफार्मरों को जलाते हैं, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं। दुर्भाग्य से अब जंगल भी इनके निशाने पर आ गए हैं हालांकि अभी ऐसी बहुत ज्यादा घटनाएं प्रकाश में नहीं आई हैं पर यह चिंताजनक तो है ही। जानबूझकर जंगलों में आग लगाने वालों के लिए कड़ी सजा के प्रावधान हैं पर समाज को भी प्रशासन का साथ देना चाहिए़। हर नागरिक का फर्ज है कि यदि उन्हें वन माफियाओं और आग लगाने वालों के बारे में कुछ पता चले तो सूचना वन विभाग या पुलिस को दें ताकि इन्हें कड़ा दंड मिल सके जो औरों के लिए भी सबक हो।
जंगल की आग का एक बहुत बड़ा कारण उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र के कुछ लोगों की यह सोच भी है कि घास में आग लगाने से बरसात में अच्छी घास आएगी।
घास के लालच में आग लगाई जाती है इसका प्रमाण यह है कि पूर्वोत्तर के पहाड़ी क्षेत्रों में जहां लोगों में इस तरह की भ्रांति नहीं है वहां जंगल में आग की इतनी अधिक घटनाएं नहीं होती हैं। उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और दूसरे राज्यों के मैदानी क्षेत्र के जंगलों में आग की घटनाएं होती हैं पर इतनी अधिक नहीं। यहां तक कि उत्तराखंड के ही मैदानी इलाके के जंगलों में पर्वतीय क्षेत्र की तुलना में बहुत कम घटनाएं होती हैं।
जो लोग घास के लिए जंगल में आग लगाते हैं उनसे मेरा कहना है कि यह बिल्कुल बेबुनियाद और तर्कहीन धारणा है कि आग लगाने के बाद बरसात में अच्छी घास होगी। यदि किसी खेत में बीज बोने के बाद दुर्घटनावश आग लग जाय तो क्या वह बीज उग पाएंगे। जब बीज ही जल जाएंगे तो भला अंकुरण कैसे होगा। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में हरेला त्यौहार मनाया जाता है जिसमें घर के मंदिर में एक पात्र में मिट्टी में अनाज के बीज बोए जाते हैं वह पांच सात दिन में अंकुरित हो जाते हैं जिसे शुभ माना जाता है। क्या वह अनाज के दाने भून कर लगाने पर उग सकते हैं।
जंगलों में घास के बीज पड़े रहते हैं , पिछले साल की घास की जड़ें जमीन में दबी रहती हैं। पुरानी जड़ें और बीज बरसात में नमी पाकर अंकुरित होते हैं और घास पनपती है। सबको पता है कि अधिक गर्मी से जड़ें और बीज मर जाते हैं तो फिर जंगल की आग में जलने के बाद घास कैसे उगेगी। आग लगाने के बावजूद जो घास उगती है वह उन बीजों के कारण उगती है जो जंगल के उस हिस्से से उड़कर आते हैं जहां आग का प्रभाव नहीं पड़ पाता है या आग के प्रभाव से बची हुई जड़ों से। सोचिए यदि प्राकृतिक रूप से बिना छेड़छाड़ के सारे बीज उगेंगे तो कितनी अच्छी और अधिक मात्रा में घास होगी।
जो लोग घास के लालच में जंगल में आग लगाते हैं उनसे मेरा यही निवेदन है कि एक तो यह दंडनीय अपराध है साथ ही यह बहुत बड़ा पाप भी है। वनाग्नि की घटना के बाद आप जंगल में जाकर देखिए आपको लाखों जले हुए पेड़ मिलेंगे, लाखों पशु पक्षियों के कंकाल और जले हुए अवशेष मिलेंगे। इसके अलावा कीड़े मकोड़े, सांप, चूहे, केंचुए ना जाने कितने छोटे जीव तो राख हो जाते हैं जिनका नामो निशान ही मिट जाता है। ये छोटे छोटे जीव यहां तक कि जीवाणु भी पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। हिरण, खरगोश जैसे जीव जो भाग सकते हैं वह भी अपने बच्चों के मोह में उनके साथ जल जाते हैं। आग की लपटों के बीच उनकी चीत्कार भी किसी को सुनाई नहीं देती। जानवर तो चीख चिल्ला सकते हैं मौका मिला तो भाग सकते हैं पर पेड़ पौधे तो चीख भी नहीं सकते। पेड़ पौधों में भी जीवन होता है बस वह अपना दर्द बयां नहीं कर सकते हैं। मेरा अनुरोध है यह पाप ना करें प्राकृतिक रूप से घास को उगने दें, वह ज्यादा और अच्छी मात्रा में उगेगी।
हर नागरिक के अंदर कर्तव्यबोध जगाने की जरूरत है। देश हमारा है, जंगल हमारे हैं। जंगल ही क्या आग तो कहीं भी देखें चाहे जंगल में या रिहायशी इलाके में बुझाने की कोशिश करनी चाहिए और प्रशासन को सूचित भी करना चाहिए़ ताकि त्वरित प्रभावी कार्यवाही की जा सके।
यदि वन क्षेत्र में कोई कोई संदिग्ध गतिविधि दिखे या कोई आग लगाता हुआ दिखे तो उसे रोकें और वन विभाग या पुलिस को सूचित करें। आपकी पहल से पर्यावरण संरक्षण में बड़ी मदद मिलेगी।
डॉ आशुतोष पन्त
पूर्व जिला आयुर्वेद अधिकारी/पर्यावरणविद।
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