शरबत पिलाने वालों से पर्यावरण विद आशुतोष पंत ने करी यह मार्मिक अपील

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ये पुण्य पर्यावरण पर भारी पड़ता है।

मई जून की गर्मी में भारत में कई स्थानों पर आपको ठंडा शरबत बांटते हुए लोग दिख जाएंगे। ये सनातन धर्म की बहुत पुरानी परम्परा है। पहले आने जाने के लिए बैलगाड़ी , घोड़ागाड़ी ही हुआ करती थी, अधिकांश लोग लंबी दूरी पैदल नापा करते थे। साधनों की कमी थी। आज की तरह जगह जगह दुकानें नहीं होती थी। उस समय लोगों की मदद के लिए लोग अपनी बस्तियों के पास सड़क किनारे प्याऊ लगाते थे। ठंडा शरबत राहगीरों को पिलाया करते थे। यह परम्परा सिक्खों ने, जैनियों ने भी अपनाई बल्कि सिक्खों ने तो और भी श्रद्धा के साथ इस परंपरा को बढ़ाया।
वर्तमान में हम देखते हैं कि हर साल शरबत बांटने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। अब जगह जगह चौराहों पर टैंट लगाकर शरबत पिलाया जाता है। लोगों की आस्था का पूरा सम्मान है पर आप विश्लेषण करें तो आज के दौर में यहां जरूरतमंद 10/20 प्रतिशत ही होते हैं। मेहनत मजदूरी करने वाले कुछ लोगों को गर्मी से राहत मिलती है बाकी राह चलते लोगों को रोक रोक कर शरबत पिलाया जाता है।
अकसर आपने देखा होगा कि लोग तिपहिया में बैठकर जा रहे हैं या गाड़ी से जा रहे हैं उनके हाथों में शरबत के ग्लास पकड़ा दिये जाते हैं। वह लोग पीते पीते चल देते हैं और जहां पर उनका पेय खत्म हुआ वहीं पर ग्लास सड़क पर डाल देते हैं। यही सबसे बड़ी चिंता की बात है।
जो पुण्य कमाने के लिए शरबत बांटते हैं मैं उनका सम्मान करता हूं कि वह किसी भी उद्देश्य से यह कर रहे हैं कम से कम कर तो रहे हैं। इसी तरह बीच बीच में लोग सड़कों के किनारे छोले पूड़ी, हलवा के भंडारे लगाते हैं। इस सबके साथ एक चिंताजनक पहलू यह है कि इन आयोजनों के बाद सड़कें कूड़ाघर बन जाती हैं। एक ही दिन में शहर भर में पच्चीसों जगह ऐसे कार्यक्रम होते हैं और बारह एक बजे तक वहां की हालत दयनीय हो जाती है। इन सभी कार्यक्रमों में सिंगल यूज़ प्लास्टिक या प्लास्टिक कोटेड पेपर ग्लास, कटोरे, चम्मच प्रयोग किए जाते हैं। वहां से आधा एक किलोमीटर दूर तक सब तरफ ये ग्लास कटोरे फैले हुए दिखाई देते हैं। इनको पूरी तरह साफ करना नामुमकिन होता है।
मैंने कई बार इन कार्यकर्मो में जाकर आयोजकों को समझाने का प्रयास किया पर नतीजा शून्य ही रहा। वहां एक दो डस्टबिन रखे तो रहते हैं पर लोग कूड़ा इधर उधर ही फेंकते हैं।
मई जून के बाद मानसून आ जाता है और ये फेंके हुए ग्लास, कटोरों के ढेर नलियों को जाम कर देते हैं। यही कूड़ा बाढ़ का कारण बनता है और गंदा पानी सड़कों पर फैलकर चलना मुश्किल कर देता है।
यदि हम थोड़ा सा समझ से काम लें तो पर्यावरण को बचाते हुए इस तरह के कार्यक्रम कर सकते हैं। यदि हर स्टॉल पर 25/30 स्टील या कांच के ग्लास – कटोरी रखे जाएँ और उन्हीं में धो धो कर खिलाया पिलाया जाए तो प्रदूषण को बढ़ने से रोका जा सकता है। जो लोग आयोजन कर रहे हैं उन्हें पुण्य कमाना है तो सफाई की पूरी जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
विचार कीजिए यदि कोई संस्था या व्यक्ति शरबत/पानी पिलाने का आयोजन कर रहा है तो वह एक या दो दिन ही किसी की प्यास बुझा पाएगा। मजदूर वर्ग के लोग जो जरूरतमंद होते हैं उन्हें रोज गर्मी में काम करना होता है, उनके लिए पानी की बोतलें खरीदना संभव नहीं होता है। क्यों ना आयोजक सार्वजनिक जगहों पर प्याऊ या वॉटर कूलर लगवा दें। इससे जरूरतमंदों की प्यास का स्थाई समाधान भी हो जाएगा और प्लास्टिक का प्रयोग ना होने से प्रदूषण भी नहीं होगा। मेरी बात पर विचार कीजियेगा।

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डॉ आशुतोष पन्त
पूर्व जिला आयुर्वेद अधिकारी/पर्यावरणविद।

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