शुभ दीपावली तमसो मा ज्योतिर्गमय: डॉक्टर अखिलेश चमोला का संदेश
दीपावली पर लक्ष्मी-काली का तादात्म्य: तमसो मा ज्योतिर्गमय
लेखक: अखिलेश चन्द्र चमोला, देवभूमि उत्तराखण्ड
दीप पर्व दीपावली केवल मिट्टी के दीयों की जगमगाहट और धन-वैभव के अर्जन तक सीमित उत्सव नहीं है; यह बाह्य तमस के विनाश और अंतर्मन में ज्ञान, विवेक तथा आत्मिक आभा के जागरण का पावन अनुष्ठान है। भारतीय सनातन परंपरा में कार्तिक अमावस्या की गहन कालिमा केवल अभाव की प्रतीक नहीं, अपितु उस परम ऊर्जा की पीठिका है जहाँ संहार और सृजन, संचय और विसर्जन एक साथ प्रतिष्ठित होते हैं। देवभूमि उत्तराखण्ड के आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में यह पावन निशा महालक्ष्मी और माँ दक्षिण काली के एकाकार रूप की उपासना का साक्षात दर्शन प्रस्तुत करती है।
तम के गर्भ से आलोक की उत्पत्ति: काली और लक्ष्मी का अभेद
लौकिक दृष्टि से दीपावली को श्री और समृद्धि की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी के आह्वान का पर्व माना जाता है। किंतु तांत्रिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से यह निशा ‘कालरात्रि’ या ‘महानिशा’ कहलाती है। जहाँ माँ लक्ष्मी स्थूल जगत में जीवन-यापन के लिए आवश्यक साधन, शांति, ऐश्वर्य और सद्भाव प्रदान करती हैं, वहीं माँ दक्षिण काली उस अंधकार, भय, अहंकार और आसुरी वृत्तियों का समूल नाश करती हैं जो आत्मा की पूर्णता के मार्ग में बाधक हैं।
माँ दक्षिण काली का स्वरूप भयप्रद नहीं, अपितु परब्रह्म का वह जाग्रत स्वरूप है जो माया के आवरण को छिन्न-भिन्न करता है। शास्त्र कहते हैं:
”लक्ष्मीर्या जगतां धात्री संहारिण्यपि कालिका।”
(सृष्टि का पोषण करने वाली जो लक्ष्मी हैं, वही विकारों का संहार करने वाली कालिका हैं।)
जब तक मन की कालरात्रि में स्थित लोभ, ईर्ष्या, वासना और अज्ञान का नाश नहीं होगा, तब तक हृदय-मंदिर में कमलासन पर आसीन महालक्ष्मी का स्थायी वास संभव नहीं है। पहले दक्षिण काली की कृपा से मन की आसुरी वृत्तियों का शमन होता है, तत्पश्चात माँ लक्ष्मी का निर्मल, शांत और सात्त्विक आलोक अंतरंग को प्रकाशित करता है।
दक्षिण काली का भाव: संहार से सृजन की यात्रा
माँ को ‘दक्षिण काली’ कहे जाने के पीछे गहरा आध्यात्मिक रहस्य है। ‘दक्षिण’ का अर्थ अनुकूल, कृपालु और दक्षिण दिशा (यम की दिशा) पर विजय प्राप्त करने वाली शक्ति है। माँ दक्षिण काली अपने साधक को मृत्यु के भय और सांसारिक बंधनों से मुक्त कर अमृतत्व की ओर ले जाती हैं।
दीपावली के पूजन में जब हम दीपक प्रज्वलित करते हैं, तो उस लौ के मूल में माँ दक्षिण काली का तप और शीर्ष पर माँ लक्ष्मी की स्वर्णमयी आभा दिखाई देती है।
काली रूप: तम, काल और संकीर्णताओं का भक्षण करने वाला असीम शून्य।
लक्ष्मी रूप: उसी शून्य से अंकुरित होने वाला जीवन, सौंदर्य, संबल और ऐश्वर्य।
उत्तराखण्ड के सिद्धपीठों—चाहे वह श्रीनगर स्थित माँ धारी देवी हों, कालीमठ की पावन पीठिका हो या हरिद्वार स्थित सिद्धपीठ दक्षिण काली मंदिर—की वायु में शक्ति और श्री का यह समन्वय सहज ही अनुभूत होता है। यहाँ की साधना परंपरा यह स्पष्ट मानती है कि शक्ति के विनाशक (काली) और पालक (लक्ष्मी) स्वरूप एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
अंतर्दीप का प्रज्वलन और व्यावहारिक संदेश
दीपावली पर माँ दक्षिण काली के भाव को आत्मसात करने का अर्थ है अपने भीतर की जड़ता और अवसादों पर विजय पाना। मात्र स्वर्ण-रजत या बाह्य धन का अर्जन यदि अहंकार को जन्म दे, तो वह दरिद्रता का ही दूसरा नाम है। वास्तविक श्री वह है जो मन को शांत, विवेकशील और परोपकारी बनाए।
इस दीपावली पर पूजा की थाल में रोली, अक्षत और दीपकों के साथ-साथ यह संकल्प भी सजाइए:
1. अहंकार की आहुति: माँ दक्षिण काली के चरणों में अपने मद, संकीर्ण स्वार्थ और कटुता का विसर्जन करें।
2. सद्भाव का आह्वान: माँ महालक्ष्मी की कृपा से प्राप्त ज्ञान और साधन को समाज के वंचित वर्ग के कल्याण हेतु समर्पित करें।
3. सत्य की प्रतिष्ठा: बाह्य दीपकों की ज्योति के साथ-साथ अंतरात्मा के दीपक को भी सदा जाग्रत रखें।
देवभूमि उत्तराखण्ड के तपोनिष्ठ संतों की पावन धारा हमें यही सिखाती है कि जब साधक अपने आंतरिक अंधकार से भयभीत न होकर माँ दक्षिण काली की शरण लेता है, तो वही अंधकार महालक्ष्मी के परम आलोक में परिवर्तित हो जाता है। आइए, इस दीपावली पर हम बाह्य अंधकार पर विजय पाने के साथ-साथ अंतर्मन के तमस का हरण कर माँ काली के संहारक बल और माँ लक्ष्मी के कल्याणकारी अनुग्रह को एक साथ नमन करें।
लेखक डॉक्टर अखिलेश चमोला विद्वान आचार्य ज्योतिष एवं राजकीय इंटर कॉलेज सुमाड़ी इंटर कॉलेज में अध्यापक हैं


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