पर्यावरण विद डॉक्टर आशुतोष पंत ने करी यह अपील
5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है और इस दिन लाखों पौधे रोपे जाते हैं। मेरा दावा है कि इस दिन सार्वजनिक स्थानों पर लगाए गए पौधों में से महज़ एक दो प्रतिशत भी बच जाएं तो गनीमत है। यह मैं वर्ष 1988 से अब तक के अपने 38 वर्षों के अनुभव के आधार पर कह सकता हूं। जून में उत्तर भारत में मौसम बेहद गर्म रहता है कहीं कहीं तो पारा 45 डिग्री के पार चला जाता है। ऐसे में धरती तप रही होती है तो उस पर लगाए गये पौधे भला कैसे बच सकते हैं। पर्यावरण दिवस पर सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर पौधे रोपने का एक रिवाज बन गया है, बिना यह सोचे कि ये पौधे बचेंगे भी या नहीं।
जो भी पर्यावरण प्रेमी इस दिन को उत्सव की तरह मनाते हैं मैं उनका हृदय से सम्मान करता हूं पर यह समझने की जरूरत है कि इस दिन केवल पौधे लगाना ही एक मात्र तरीका नहीं है। हम और भी बहुत सी गतिविधियों द्वारा पर्यावरण संरक्षण कर सकते हैं। पॉलीथिन हटाकर, लोगों को उसका प्रयोग ना करने के प्रति जागरूक करके, पानी – बिजली बचाने का संदेश देकर, नुक्कड़ नाटकों द्वारा साफ सफाई के लिए प्रेरित करके, पर्यावरण संरक्षण विषय पर बच्चों की चित्रकला प्रतियोगिता, भाषण प्रतियोगिता कराकर, जंगल को आग से बचाने का संदेश देकर कई तरह से सकारात्मक पहल कर सकते हैं।
क्या हम मानसून तक इंतजार नहीं कर सकते। क्या 5 जून को ही औपचारिकता करनी जरूरी है। यदि किसी को 5 जून को पौधे लगाने का बहुत ही मन हो तो पहले यह पता कर लें कि पिछले साल इस दिन लगाए गए कितने पौधे बच पाए हैं।
हम पर्यावरण प्रेमी हैं तो इसे साबित करने की जरूरत नहीं है हम पूरे साल कोई ना कोई गतिविधि कर सकते हैं। उदाहरण के लिए जंगली पशुओं के पानी पीने की व्यवस्था के लिए मुझे वन विभाग ने अनुमति दे दी है। हम अगले 3/4 दिन में 150 लीटर क्षमता के 20 सीमेंट से बनी नांद जंगल में लगा देंगे।
पौधरोपण भी धरती को बचाने के लिए बहुत जरूरी है पर वह सही समय पर किया जाय तभी उचित है। 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाने की संकल्पना यूरोपीय देशों ने अपने हिसाब से की है। उत्तर , पश्चिम और मध्य भारत में इस दौरान मौसम प्रतिकूल रहता है तो हमें अपने हिसाब से कार्यक्रम तय करने चाहिए़।
केवल फोटोशूट के लिए पौधे लगाना तो उनकी हत्या करने जैसा है। मानसून आने के बाद अधिक से अधिक पौधे लगाएं और 3 साल तक उनकी देखभाल
की जिम्मेदारी भी लें तभी पौधारोपण की सार्थकता है।
कृपया मेरे अनुरोध पर विचार करें और सार्वजनिक जगहों पर मानसून आने के बाद ही पौधे लगाएं।
डॉ आशुतोष पन्त
पूर्व जिला आयुर्वेद अधिकारी/पर्यावरणविद।
पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन पर निबंध एवं चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन