श्राद्ध करना क्यों जरूरी है बता रहे हैं आचार्य प्रकाश बहुगुणा
।। श्राद्धकर्म पर विशेष ।।
वैदिक परम्परानुसार पुत्र का पुत्रत्व तभी सार्थक होता है, जब वह अपने माता-पिता की सेवा करे व उनके मरणो पररान्त उनकी मृत्यु तिथि व महालय (पितृपक्ष) में विधिवत श्राद्ध करें।
प्रत्येक मानव पर जन्म से ही तीन ऋण होते हैं – देव, ऋषि व पितृ। श्राद्ध की मूल संकल्पना वैदिक दर्शन के कर्मवाद व पुनर्जन्मवाद पर आधारित है।
मनु व याज्ञवल्क्य ऋषियों ने धर्मशास्त्र में नित्य व नैमित्तिक श्राद्धों की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए कहा कि श्राद्ध करने से कर्ता पितृऋण से मुक्त हो जाता है तथा पितर सन्तुष्ट रहते हैं, जिससे श्राद्धकर्ता व उसके परिवार का कल्याण होता है। श्राद्ध महिमा में कहा गया है –
आयुः पूजां धनं विद्यां स्वर्ग मोक्ष सुखानि च।
प्रयच्छति तथा राज्यं पितरः श्राद्ध तर्पिता।।
जो लोग अपने पितरों का श्राद्ध श्रद्धापूर्वक करते हैं, उनके पितर सन्तुष्ट होकर उन्हें आयु, सन्तान, धन, स्वर्ग, राज्य मोक्ष व अन्य सौभाग्य प्रदान करते हैं।
हमारी संस्कृति में माता-पिता व गुरु को विशेष श्रद्धा व आदर दिया जाता है, उन्हें देव तुल्य माना जाता है।
”पितरं प्रीतिमापन्ने प्रियन्ते सर्वदेवताः“
अर्थात् पितरों के प्रसन्न होने पर सारे ही देवता प्रसन्न हो जाते हैं। महालय श्राद्ध 17 दिनों तक होता है। अनन्त चतुदर्शी से इसका प्रारम्भ होता है। प्रथम पूनम को विष्णु का श्राद्ध होता है, फिर पूर्णिमा से अमावस्या तक जो तिथियाँ होती हैं उनमें पितरों के श्राद्ध कर्म सम्पन्न होते हैं।
श्राद्धकर्म पक्ष में पितर (पूर्वज) अपने चहेते लोगों (वंशज) के द्वार पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक खड़े रहते हैं और अपने वंशजों द्वारा धान, वस्त्रादि दान करने पर उन्हें ग्रहण करते हैं और शुभाशीर्वाद देते है।
ब्रह्मवैवर्त पुराणानुसार सामर्थ्यवान होते हुए भी जो व्यक्ति पितरों का श्राद्ध नहीं करता, उसके पितर उसे शाप दे देते हैं, जिससे वह रोगी, दुखी या वंशहीन हो जाता है। अतः हमारी संस्कृति में श्राद्ध का बहुत महत्व है।
श्राद्ध कर्म: श्राद्ध प्रकाशानुसार
बृहस्पति कहते हैं
“संस्कृतं व्यंजनाथं च
पयोदधि घृतान्वितम्।
श्रद्धया दीयते यस्मात्
श्राद्धं तेज प्रकीर्तितम्।।
आदर सहित पकाये हुए नानाविध शुद्ध पकवान व दूध, दही, घी आदि श्रद्धापूर्वक पितरों को अर्पित करने का नाम श्राद्ध है।
प्रातःकाल तिल, कुश, अक्षत, जौ एवं जल द्वारा तर्पण करके जल दिया जाता है। ब्राह्मवेला, गया व गौशाला में मृत्यु एवं कुरुक्षेत्र में श्राद्ध ये चारों मोक्ष के कारक हैं।
पितृशक्ति की महिमा:- पितरों की शक्ति ‘सूक्ष्म’ शरीर होने के कारण विशाल बन जाती है। वे शक्ति व सिद्धि के निश्चित रूप बन जाते हैं, स्वास्थ्य व गर्भ के भी निर्णायक बन जाते हैं। वे जीवन में रस, माधुर्य व सौंदर्य घोल सकते हैं, उनके लिए कोई भी कार्य असम्भव नहीं होता।
अतः अपने पितृ दिवस पर श्राद्ध व तर्पण कराएँ – पीपल, बड़ या खेजड़ी (शमी) वृक्ष को सींचें, नदी या तालाब में जल अर्पित करें क्योंकि पिता के जिस शुक्राणु के साथ जीव माता के गर्भ में जाता है, उसमें 84 अंश होते हैं, जिनमें से 28 अंश तो शुक्रधारी पुरुष के स्वयं के भोजनादि से उपार्जित होते हैं और 56 अंश पूर्व पुरुषों के रहते हैं। उनमें से 21 अंश उसके पिता के 15 अंश पितामह के, 10 अंश प्रपितामह के, 6 अंश चतुर्थ पुरुष के, 3 पंचम पुरुष के और एक षष्ठ पुरुष के होते हैं।
इस तरह सात पीढियों तक वंश के सभी पूर्वजों के रक्त की एकता रहती है। अतः पिंडदान मुख्यतः तीन पीढ़ियों तक के पितरों को ही दिया जाता है क्योंकि ऊपर वाले पितरों के दस से कम अंश जीवात्मा को मिलते हैं। हमारे भीतर प्रवाहित रक्त में हमारे पितरों के अंश हैं, जिसके कारण हम उनके ऋणी होते हैं।
यह ऋण उतारने के लिए श्राद्ध कर्म करना हमारा धर्म है। पितरों के लिए श्रद्धा से श्राद्ध करना हमारा कर्तव्य है।
श्राद्ध करना क्यों जरूरी है
श्राद्ध करने से पहले हमें यह जान लेना चाहिए कि शरीर से निकली आत्मा के समक्ष केवल दो मार्ग होते हैं – प्रकाश मार्ग या कृष्ण मार्ग। उच्च शुद्ध कर्मों के कारण जो अपने भीतर तेज प्रकाश ले जाते हैं, उनकी आत्मा तो स्वर्ग लोक, विष्णुलोक, ब्रह्मलोक की ओर चल पड़ती है,
परन्तु असामान्य या पापकर्म वाले की आत्मा अन्धकार मार्ग से सोम (पितृ) की ओर जाती है। इस यात्रा में उन्हें स्वयं शक्ति की आवश्यकता होती है, जिसकी पूर्ति हम पिण्डदान द्वारा करते हैं। प्रकाश रहित इन जीवों के लिए सोमतत्व युक्त पदार्थों से पिण्डदान किया जाता है। सोमतत्व प्राप्त करके नई ऊर्जा से सम्पन्न होकर ऐसी आत्माएँ चन्द्रमा की ओर बढ़ जाती हैं।
सोमतत्व युक्त पिण्डदान में प्रयुक्त सामग्री है – यव (जौ), अक्षत, तिल, शहद, जल, गोदुग्ध, दही आदि। इन पदार्थों में सोमतत्व की अधिकता होती है।
चन्द्रमा पर जाने वालों के लिए यह उपयुक्त भोजन होता है। चन्द्रमा पर जल है, परन्तु सूक्ष्म होने के कारण पितर स्थूल जल से प्यास बुझाने में एकदम असमर्थ रहते हैं। ऐसी स्थिति में श्राद्ध – तर्पण से उपलब्ध जल पर उनकी दृष्टि लगी रहती है।
अतः श्राद्धकर्म में जल तर्पण का विशेष महत्व है। हमारा एक माह चन्द्रमा का एक अहोरात्र होता है। अमावस्या को सूर्य चन्द्रमा के ठीक ऊपर स्थित होता है,
इसलिए ऊर्ध्व भाग पर रह रहे पितरों के लिए कृष्णपक्ष उत्तम रहता है। वस्तुतः कृष्णपक्ष की अष्टमी को उनके दिनों का उदय होता है, अमावस उनका मध्याह्न है तथा शुक्ल पक्ष की अष्टमी उनका दिन रहता है।
अमावस को किया गया श्राद्ध, तर्पण, पिण्डदान उन्हें सन्तुष्टि व ऊर्जा प्रदान करते हैं। इसलिए प्रत्येक अमावस्या पितृ अमावस्या कहलाती है।
श्राद्धपक्ष का वैज्ञानिक आधार
सूर्य मेष से कन्या संक्रान्ति तक उत्तरायण व तुला से मीन राशि तक दक्षिणायन रहता है। इस दौरान शीत ऋतु का आगमन प्रारम्भ हो जाता है। कन्या राशि शीतल राशि है। इस राशि की शीतलता के कारण चन्द्रमा पर रहने वाले पितरों के लिए यह अनुकूल समय होता है। यह समय आश्विन मास होता है,
पितर अपने लिए भोजन व शीतलता की खोज में पृथ्वी तक आ जाते हैं। जिनके वंश में सभी रिश्तेदार होते हैं, वे आशा लेकर आते हैं कि कोई तो होगा तर्पण व पिण्डदान देने वाला। पिण्ड मिलने पर शुभाशीष देकर पितर पुनः अपने लोक लौट जाते हैं और नहीं मिलने पर श्राप दे देते हैं।
अतः पितरों को निराश नहीं लौटाना चाहिए। तिथि याद न रहने पर अमावस्या को अवश्य श्राद्ध व तर्पण करना चाहिए। इससे सौभाग्य में उत्तरोत्तर वृद्धि होती रहती है।
भविष्य पुराण के अनुसार श्राद्ध कुल 12 प्रकार के होते हैं।
- नित्य 2. नैमित्तिक 3. काम्य 4. वृद्धि, 5. सपिंडन, 6. यार्वण, 7. गोष्ठी, 8. शुद्धर्थ, 9. कमारा 10. दैविक 11. यावार्थ 12. पुष्ट्यर्थ।
तर्पण कर्म का महत्व:– श्राद्ध में तर्पण का बहुत महत्व है। यह अनिवार्य कर्म है, क्योंकि इससे पितृ सन्तुष्ट व तृप्त होते हैं। कहते हैं कि ब्राह्मण भोजन से एक पितर जबकि तर्पण से सभी पितर तृप्त व सन्तुष्ट होते हैं।
ब्रह्मवैवर्त पुराणानुसार– जिस प्रकार वर्षा का जल सीप में गिरने से मोती, कदली में गिरने से कर्पूर, खेत में गिरने से अन्न और धूल में गिरने से कीचड़ बन जाता है।
उसी प्रकार तर्पण के जल से सूक्ष्म वाष्प कण देवयोनि के पितर को अमृत, मनुष्य योनि के पितर को अन्न, पशु योनि के पितर को चारा व अन्य योनियों के पितरों को उनके अनुरूप भोजन व सन्तुष्टि प्राप्त होती है।
ज्योतिष शास्त्रानुसार– शुक्ल पक्ष देवपूजन तथा कृष्णपक्ष पितृपूजन के लिए उत्तम माना गया है। अमावस्या तिथि भी सर्वपितृ अमावस्या के नाम से जानी जाती है।
हव्य प्रदानेस्मरान् पितृश्च
कव्य प्रदानै यदि पूजयेथा।
गृहस्थ जीवन में हव्य के द्वारा देवगण तथा कव्य के द्वारा पितृजन की पूजा करनी चाहिए।
उपरोक्त विषय मे अधिक जानने हेतु इन पुस्तकों का सहयोग लीजिए।
1.पितर हमारे अदृश्य सहायक।
2.पितरों को श्रद्धा दें वे हमें शक्ति देंगे।
3.विक्षुब्ध मनःस्थिति और प्रेत योनि।
4.मरने के बाद हमारा क्या होता है?
5.मरणोत्तर जीवन सत्य और तथ्य।
6 गहना कर्मणोगतिः ।
7 मरणोत्तर श्राद्धकर्म विधान।
पितृदोष से बचने के लिए अपने पूर्वजों के सम्मान में श्राद्ध धर्म को अपनायें। जिससे आपके जीवन में आने वाले कई तरह के अनचाहे परेशानीयों से छुटकारा मिल सकता है।
पितृ पक्ष का हिंदू धर्म में अति विशेष महत्व है. पितृ पक्ष या श्राद्ध लगभग 16 दिनों का होता है. पितृ पक्ष में पितरों को याद किया जाता है, उनके प्रति आदर भाव प्रकट किया जाता है। पितृ पक्ष में पूजा करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। पितृ पक्ष को सोहल श्राद्ध, महालय पक्ष और अपर पक्ष आदि के नामों से भी जाना जाता है।
पितृपक्ष श्राद्ध हमारे कोई भी अपने जिस तिथि में अग्निशमन करते हैं ।उस तिथि पर ही करना उचित होता है। यदि तिथि की जानकारी उपलब्ध नहीं है तो अमावस्या को श्राद्ध धर्म अपना सकते हैं।
16 दिन तक चलने वाले पितृ पक्ष में पितरों की आत्मा की तृप्ति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान आदि की क्रियाएं करते हैं। पितृ पक्ष में पितरों के श्राद्ध वाले दिन कौआ को भी भोजन कराने की परंपरा है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार ऐसा करने से भोजन कौवों के माध्यम से पितरों तक पहुंच जाता है. इसके साथ ये भी मान्यता है कि पितृ पक्ष में पितर कौवे के रूप में पृथ्वी पर आते हैं। पितरों के समर्पित इन दिनों में हर दिन उनके लिए खाना निकाला जाता है। इसके साथ ही उनकी तिथि पर बह्मणों को भोज कराया जाता है।
इन 16 दिनों में कोई शुभ कार्य जैसे, गृह प्रवेश, कानछेदन, मुंडन, शादी, विवाह नहीं कराए जाते। इसके साथ ही इन दिनों में न कोई नया कपड़ा खरीदा जाता और न ही पहना जाता है। पितृ पक्ष में लोग अपने पितरों के तर्पण के लिए पिंडदान, हवन भी कराते हैं।
पितरों को शत शत नमन
गांव गांव में बनेगी अमृत वाटिकाऐं
आंगन का मिलन में पहुंचे सांसद अजय भट्ट