सावन का सोमवार : आखिर किस अवस्था का नाम है शंकर बता रहे हैं महात्मा सत्यबोधानंद जी

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जब जीवन में कोई प्रश्न न रहे, वहीं शंकर प्रकट होते हैं
मनुष्य का पूरा जीवन प्रश्नों से भरा हुआ है। मैं कौन हूँ? इस संसार में क्यों आया हूँ? सुख और दुःख का कारण क्या है? मृत्यु के बाद क्या होता है? जीवन का उद्देश्य क्या है? ऐसे अनगिनत प्रश्न मन को निरंतर विचलित करते रहते हैं। जब तक ये प्रश्न बने रहते हैं, तब तक मन अशांत रहता है। लेकिन जिस क्षण जीवन की सारी शंकाएँ समाप्त हो जाती हैं और आत्मज्ञान का प्रकाश प्रकट होता है, वहीं शंकर प्रकट होते हैं।
शंकर केवल एक देवता का नाम नहीं है, बल्कि वह एक चेतना की अवस्था है। “शं” का अर्थ है कल्याण और “कर” का अर्थ है करने वाला। अर्थात जो समस्त शंकाओं, भय और अज्ञान को समाप्त कर जीवन में कल्याण का मार्ग प्रशस्त करे, वही शंकर हैं।
मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि उसके पास उत्तर नहीं हैं, बल्कि यह है कि वह स्वयं को नहीं जानता। जो व्यक्ति स्वयं से अपरिचित है, उसके जीवन में भ्रम, भय और असंख्य प्रश्न बने रहते हैं। वह कभी बाहरी परिस्थितियों को दोष देता है, कभी लोगों को, तो कभी भाग्य को। उसका मन एक प्रश्न से निकलकर दूसरे प्रश्न में उलझ जाता है।
भगवान शंकर का स्वरूप हमें इसी अज्ञान से बाहर निकलने की प्रेरणा देता है। उनके मस्तक पर विराजमान चंद्रमा शीतलता और विवेक का प्रतीक है। उनकी बंद आँखें भीतर की यात्रा का संकेत देती हैं। उनका ध्यानमग्न स्वरूप हमें बताता है कि जीवन के उत्तर बाहर नहीं, बल्कि भीतर छिपे हुए हैं।
जब व्यक्ति स्वयं के भीतर उतरना प्रारंभ करता है, तब उसे धीरे-धीरे समझ आने लगता है कि वह केवल शरीर नहीं है, केवल नाम और पहचान नहीं है, बल्कि वह एक शुद्ध चेतना है। यही आत्मज्ञान है। आत्मज्ञान के बाद जीवन के अनेक प्रश्न स्वतः समाप्त होने लगते हैं।
जिस प्रकार सूर्योदय होते ही अंधकार स्वयं समाप्त हो जाता है, उसी प्रकार आत्मज्ञान का प्रकाश प्रकट होते ही शंकाएँ मिटने लगती हैं। तब व्यक्ति यह समझ जाता है कि जीवन में जो कुछ घट रहा है, वह एक व्यापक व्यवस्था का हिस्सा है। वह परिस्थितियों से लड़ना छोड़कर उन्हें समझने लगता है। उसका मन शांत होने लगता है।
शंकर का वास्तविक अर्थ यही है—जहाँ प्रश्न समाप्त हो जाएँ और अनुभव प्रारंभ हो जाए। जब तक हम केवल विचारों में उलझे रहते हैं, तब तक सत्य दूर दिखाई देता है। लेकिन जब हम अपने भीतर के मौन में प्रवेश करते हैं, तब सत्य स्वयं प्रकट होने लगता है।
जीवन में शंकर का प्रकट होना किसी चमत्कार का परिणाम नहीं है। यह भीतर जागृत होने वाली चेतना का नाम है। जब व्यक्ति अपने अहंकार, भय, क्रोध और मोह को समझ लेता है और उनसे ऊपर उठने का प्रयास करता है, तब उसके भीतर शांति का उदय होता है। उस शांति में कोई संघर्ष नहीं होता, कोई बेचैनी नहीं होती और कोई प्रश्न भी शेष नहीं रहता।
इसका अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति संसार से दूर चला जाता है या उसके सामने परिस्थितियाँ आनी बंद हो जाती हैं। परिस्थितियाँ पहले की तरह ही आती हैं, लेकिन उन्हें देखने का दृष्टिकोण बदल जाता है। अब वह हर घटना में शिक्षा देखता है, हर अनुभव में विकास का अवसर देखता है और हर परिस्थिति को सहज भाव से स्वीकार करता है।
वास्तव में शंकर बाहर कहीं दूर नहीं हैं। वे हमारे भीतर ही विद्यमान हैं। जब मन की अशांति समाप्त हो जाती है, जब स्वयं को जानने की यात्रा पूर्ण होने लगती है, जब जीवन के प्रति समर्पण और समझ उत्पन्न होती है, तब शंकर का अनुभव होने लगता है।
इसलिए यदि जीवन में शांति चाहिए, यदि प्रश्नों से मुक्ति चाहिए और यदि वास्तविक आनंद का अनुभव करना है, तो स्वयं को जानने की यात्रा प्रारंभ करनी होगी। क्योंकि जब जीवन में कोई प्रश्न न रहे, जब मन पूर्णतः शांत हो जाए और आत्मज्ञान का प्रकाश प्रकट हो जाए, वहीं शंकर प्रकट होते हैं।
M.satyabodhanand
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