राधाष्टमी पर्व आज, जानिए इसका पौराणिक महत्व
सनातन धर्म में एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण त्योहार है, जो भगवान श्रीकृष्ण की ह्लादिनी शक्ति (आनन्द प्रदान करने वाली शक्ति) श्री राधा रानी के जन्मोत्सव के रूप में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। कृष्ण जन्माष्टमी के ठीक 15 दिन बाद आने वाला यह पर्व श्रद्धा, भक्ति और प्रेम का साक्षात् प्रतीक है।तिथि और धार्मिक महत्वराधा अष्टमी हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन तिथि पर श्री राधा जी का प्राकट्य उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में स्थित बरसाना (या रावल ग्राम) में हुआ था। उन्हें राजा वृषभानु और माता कीर्ति की पुत्री के रूप में जाना जाता है, जो पौराणिक कथाओं के अनुसार अयोनिजा (यानी जिन्होंने माता के गर्भ से जन्म नहीं लिया, बल्कि कमल के फूल पर अवतरित हुईं) थीं।आध्यात्मिक महत्ववैष्णव परंपरा और विशेषकर गौड़ीय संप्रदाय में राधा अष्टमी का महत्व कृष्ण जन्माष्टमी के समान ही, बल्कि कुछ मायनों में उससे भी अधिक माना गया है। शास्त्रों के अनुसार:कृष्ण भक्ति का माध्यम: श्री कृष्ण की पूर्ण कृपा प्राप्त करने के लिए राधा रानी की आराधना अनिवार्य मानी गई है। कहा जाता है कि केवल ‘राधा’ नाम का जाप करने से ही भगवान श्री कृष्ण प्रसन्न हो जाते हैं।प्रेम और समर्पण की पराकाष्ठा: राधा-कृष्ण का संबंध लौकिक न होकर आध्यात्मिक है। यह जीवात्मा और परमात्मा के निश्छल प्रेम का सर्वोच्च उदाहरण है।व्रत और पूजन विधिइस दिन श्रद्धालु पूरी श्रद्धा के साथ व्रत रखते हैं और विशेष पूजा-अर्चना करते हैं:मध्याह्न पूजा: राधा जी का प्राकट्य दोपहर के समय हुआ था, इसलिए मुख्य पूजा दोपहर (मध्याह्न) में की जाती है।अभिषेक: राधा रानी की धातु या मिट्टी की मूर्ति को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर) से स्नान कराया जाता है।श्रृंगार: उन्हें सुंदर वस्त्र, आभूषण और विशेष रूप से नीले या लाल रंग के वस्त्र अर्पित किए जाते हैं।भोग और आरती: राधा जी को विभिन्न प्रकार के पकवानों और मिठाइयों का भोग लगाया जाता है। इसके बाद धूप-दीप जलाकर उनकी आरती उतारी जाती है और राधा-कृष्ण के भजनों का गान किया जाता है।उत्सव का केंद्र: बरसानायूं तो यह पर्व पूरे देश में मनाया जाता है, लेकिन ब्रज भूमि, विशेषकर बरसाना, रावल और वृंदावन में इसकी रौनक देखते ही बनती है। बरसाना के प्रसिद्ध ‘श्री जी मंदिर’ (राधा रानी मंदिर) को भव्य रूप से सजाया जाता है। इस दिन ब्रज में लाखों श्रद्धालु जुटते हैं, बधाई गान गाए जाते हैं, और चारों ओर “राधे-राधे” की गूंज सुनाई देती है
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