युग ऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी का आलेख: क्रोध से बचें

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🌴 १९ सितम्बर २०२६ शनिवार 🌴
भाद्रपद शुक्लपक्ष अष्टमी २०८३
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‼️ऋषि चिंतन ‼️
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सर्वनाशी महाशत्रु “क्रोध” से बचें
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👉 “क्रोध” का आवेश शरीर पर क्या असर डालता है और बुद्धि को कैसा भ्रष्ट कर देता है? उसके उदाहरण हम सब आए दिन अपने आस-पास ही देखते रहते हैं। गुस्से से तमतमाया चेहरा राक्षसों जैसा बन जाता है। आँखें, होठ, नाक आदि पर आवेशों के उभार प्रत्यक्ष दीखते हैं। मुँह से अशिष्ट शब्दों का उच्चारण चल पड़ता है। रक्त प्रवाह की तेजी से शरीर डोलने लगता है। हाथ-पैर काँपते और रोएँ खड़े होते देखे जाते हैं, ऐसा व्यक्ति स्वयं एक समस्या बन जाता है। ऐसी दशा होने पर हितैषी लोग सबसे पहला काम यह करते हैं कि आवेशग्रस्त को येन-केन-प्रकारेण शांत करते हैं। जिस कारण उत्तेजना आई थी, उसका निवारण करने पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता, जितना कि आवेग ठंढा करने पर; किसी भी प्रतिकूलता में उतनी हानि नहीं होती, जितनी कि आवेशग्रस्तता से। इस मोटी जानकारी से हर कोई परिचित रहता है, इसलिए हितैषियों का प्रथम कार्य गुस्सा ठंढा करना होता है। वैज्ञानिक तथ्य यह है कि एक घंटे का क्रोध एक दिन के तेज बुखार से भी अधिक जीवनी शक्ति का विनाश करता है।
👉 रक्तचाप में व्यतिरेक दो प्रकार के होते हैं- एक ऊँचा दूसरा नीचा। उच्च रक्तचाप, हाई ब्लड प्रेशर में बेचैनी बढ़ने के कारण कष्ट होता है। निम्न रक्तचाप, लो ब्लड प्रेशर के लक्षण तो भिन्न होते हैं, पर कष्ट उससे भी उतना ही होता है। लो ब्लड प्रेशर का मरीज भारी कमजोरी अनुभव करता है और अपने को अपंग, असहाय जैसी स्थिति में पाता है। इन दोनों ही प्रकार के व्यतिरेकों में रोगी की कार्यक्षमता एवं मनःस्थिति पर हानिकारक प्रभाव लगभग एक जैसा ही होता है।
👉 “क्रोध” की “उच्च रक्तचाप” से और “खिन्नता” की “निम्न रक्तचाप” से तुलना की जा सकती है। क्रोध वर्ग में द्वेष, घृणा, आक्रमण, विनाश जैसे क्रूर प्रकृति के विचार एवं कृत्य गिने जा सकते हैं। खिन्नता वर्ग में निराशा, चिंता, शोक, भय, संकोच जैसी निष्क्रियता के समतुल्य और अस्थिरता, अव्यवस्था उत्पन्न करने वाला कहा उत्पन्न करने वाली प्रवत्तियों की गणना होती है। इन्हें ज्वार-भाटा कहा जा सकता है। उफनते समुद्र में तैरना कितना कठिन होता है, इसे सभी जानते हैं।
👉 शोकग्रस्त, भयभीत, निराश व्यक्ति की मनोदशा उसके अच्छे-खासे स्वास्थ्य को देखते-देखते तोड़-मरोड़कर रख देती है। चेहरे पर मुरदनी छा जाती है। सही आवाज तक नहीं निकलती। लगता है कि शरीर को काठ मार गया, कुछ करते-धरते नहीं बनता है, भूख-प्यास गायब हो जाती है। नींद आने में भारी कठिनाई पड़ती है। क्रोध में भी लगभग ऐसा ही होता है। अंतर इतना भर रहता है कि “खिन्नता” में, बरफ में जमने और गलने जैसी स्थिति होती है, तो “उतेजना” में आग से जलने-उबलने जैसी। सामान्य स्थिति तो दोनों ही दशाओं में नष्ट हो जाती है और न केवल मस्तिष्क, वरन साथ-साथ शरीर भी अपनी साधारण गतिविधियाँ जारी रख सकने में असमर्थ बन जाता है।
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मन के हारे हार है, मन के जीते जीत Code VN-06 पृष्ठ ०५
🍁।।पं श्रीराम शर्मा आचार्य।।🍁
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