करवाचौथ पर पढ़िए डॉ अखिलेश चमोला का ज्ञान वर्धक आलेख
करवा चौथ: आस्था, अखंड सुहाग और देवभूमि की पावन संस्कृति
— डाॅ. अखिलेश चन्द्र चमोला, देवभूमि उत्तराखण्ड
भारतीय संस्कृति में पर्व केवल तिथियों का फेर नहीं, अपितु आत्मा से परमात्मा और हृदय से संबंधों को जोड़ने वाले दिव्य सेतु हैं। इन्हीं पावन पर्वों की शृंखला में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला ‘करवा चौथ’ का व्रत भारतीय नारी के अप्रतिम त्याग, अगाध समर्पण और अखंड सौभाग्य की पावन साधना का जीवंत प्रतीक है।
देवभूमि उत्तराखण्ड के हिमाच्छादित शिखरों, सुरम्य घाटियों और कल-कल बहती पतित-पावनी नदियों के सान्निध्य में जब यह पर्व दस्तक देता है, तो प्रकृति और संस्कृति का यह संगम और भी आलौकिक तथा हृदयग्राही बन जाता है।
१. तप, संयम और आत्मिक निष्ठा का महापर्व
करवा चौथ केवल एक पारंपरिक अनुष्ठान मात्र नहीं, बल्कि दाम्पत्य जीवन में परस्पर विश्वास, आदर और अटूट प्रेम की मूक प्रतिज्ञा है। भोर की पहली किरण फूटने से पूर्व सरगी ग्रहण कर आरंभ होने वाला यह ‘निर्जला व्रत’ इस बात का प्रमाण है कि प्रेम केवल सुख-सुविधाओं का भोग नहीं, बल्कि त्याग और तपस्या की कसौटी पर खरा उतरने वाला शाश्वत भाव है।
दिनभर बिना अन्न-जल ग्रहण किए सुहागिनें अपने पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी जीवन के लिए माँ गौरी और भगवान शिव की आराधना में लीन रहती हैं। यह तपस्या नारी की उस अंतःशक्ति को उजागर करती है, जो अपने संकल्प मात्र से नियति की लकीरों को भी मोड़ देने का सामर्थ्य रखती है—ठीक माता सती और सावित्री की भांति।
२. देवभूमि उत्तराखण्ड के आंगन में करवा चौथ
उत्तराखण्ड, जो स्वयं माँ उमा और भगवान देवाधिदेव महादेव की पावन तपोभूमि है, वहाँ प्रेम और तपस्या की यह अभिव्यक्ति और अधिक प्रासंगिक हो उठती है।
प्रकृति संग साज-श्रृंगार: पर्व के दिन देवभूमि के आंगन ऐपण (पारंपरिक लोक अल्पना कला) की शुभ्र व लाल रेखाओं से सज उठते हैं।
संस्कृति और परम्परा: पारंपरिक वेशभूषा में सजी मातृशक्ति जब हाथों में पूजा की थाली और मिट्टी का करवा लिए माँ पार्वती की स्तुति करती है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं माँ नंदा-सुनंदा धरती पर उतरकर अपने भक्तों को सौभाग्य का वरदान दे रही हों।
पहाड़ी लोक-आस्था: यहाँ के शांत, निर्मल वातावरण में वैदिक मंत्रों और लोक गीतों की मधुर ध्वनि संपूर्ण परिवेश को आध्यात्मिक शांति से भर देती है।
३. छलनी से झलकता प्रेम और चंद्रमा का दीदार
संध्या ढलते ही प्रतीक्षा के क्षण और अधिक भावुक व मनोहारी हो जाते हैं। जब नीले गगन के क्षितिज पर रूपहला चंद्रमा उदय होता है, तो सुहागिनों के चेहरे पर थकावट की जगह आस्था का दिव्य तेज दमकने लगता है।
छलनी की ओट से पहले अमृतमयी चंद्रमा और फिर उसी दृष्टि से जीवनसाथी के मुख का दर्शन करना—यह दृश्य सांसारिक संबंधों की सबसे पवित्र परिणति है। अर्घ्य देकर, छलनी के पार मुस्कुराते हुए पति के हाथों से जल की पहली घूंट पीना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि दोनों आत्माओं के एक-दूजे में विलीन हो जाने की मौन अनुभूति है।
जीवन मूल्यों का संदेश
आज के आधुनिक और भागदौड़ भरे युग में करवा चौथ जैसे पर्व हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखने का कार्य करते हैं। यह पर्व स्मरण कराता है कि एक सुखी समाज और परिवार की नींव समर्पण, सम्मान और एक-दूसरे के प्रति कर्तव्यनिष्ठा पर ही टिकी है।
देवभूमि उत्तराखण्ड के इस पावन आंचल से समस्त मातृशक्ति और सौभाग्यवती बहनों को करवा चौथ की हार्दिक शुभकामनाएं। माँ जगदम्बा और भगवान शिव की कृपा से आप सभी का सुहाग अखंड रहे, जीवन में प्रेम और उल्लास की सरिता यूं ही अविरल बहती रहे।
लेखक राज्यपाल अवार्ड से सम्मानित प्रख्यात शिक्षाविद् हैं

