धरातल पर नहीं उतर पा रही महिला सशक्तिकरण की परिकल्पना, पूर्व प्रधान दीपा कांडपाल का आलेख
पंचायतों में महिला प्रतिनिधित्व केवल नाम तक सीमित :दीपा काण्डपाल
उत्तराखंड की पंचायतों में महिला आरक्षण की मंशा और उसकी ज़मीनी हकीकत के बीच गहरा अंतर दिखाई दे रहा है। अनेक स्थानों पर निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके परिवार के पुरुष पंचायत का संचालन कर रहे हैं, जिससे महिला सशक्तिकरण की अवधारणा मात्र औपचारिकता बनकर रह गई है।
इससे भी अधिक दुखद तथ्य यह है कि इस सामाजिक और लोकतांत्रिक विकृति पर मीडिया की खामोशी बनी हुई है। वहीं, वे सामाजिक संगठन जो स्वयं को महिला अधिकारों का प्रहरी बताते हैं, उनकी ओर से भी कोई ठोस आवाज़ न उठाया जाना महिलाओं के प्रति एक प्रकार की अवमानना है।
महिला आरक्षण का उद्देश्य महिलाओं को नेतृत्व, निर्णय और आत्मनिर्भरता प्रदान करना था। यदि महिलाओं को स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अवसर ही नहीं मिलेगा, तो समानता की दिशा में समाज कैसे आगे बढ़ेगा—यह एक गंभीर प्रश्न है।
आवश्यक है कि पंचायत व्यवस्था में महिला प्रतिनिधियों को वास्तविक अधिकार, सुरक्षा और प्रशासनिक सहयोग मिले तथा मीडिया और सामाजिक संगठन इस विषय पर अपनी जिम्मेदारी निभाएं।
दीपा कांडपाल
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