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अज्ञान पर आत्मज्ञान की शाश्वत विजय का प्रतीक है दीपावली : अखिलेश चमोला

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लेखक: अखिलेश चन्द्र चमोला, देवभूमि उत्तराखण्ड
​भारतीय संस्कृति में उत्सव केवल उल्लास का माध्यम नहीं, बल्कि वे प्रकृति, अध्यात्म, सामाजिक समरसता और आत्म-अनुसंधान के जीवंत प्रतीक हैं। इनमें सर्वोपरि है—दीपावली, जो तिमिर पर प्रकाश, असत्य पर सत्य और अज्ञान पर आत्मज्ञान की शाश्वत विजय का उद्घोष करती है। हिमालय की पुण्यधरा, देवाधिदेव महादेव एवं मां गंगा के पावन आंचल में बसे देवभूमि उत्तराखण्ड से जब हम इस महापर्व का चिंतन करते हैं, तो दीपों की यह पांत केवल बाह्य जगत को ही नहीं, बल्कि अंतःकरण को भी प्रकाशित करती प्रतीत होती है।
​कार्तिक मास की घनी कृष्ण अमावस की रात्रि में जब धरा दीपमालाओं से जगमगाती है, तो वह संदेश देती है कि चाहे अंधकार कितना भी घना क्यों न हो, सत्य और निष्ठा का एक छोटा-सा दीपक भी उसे परास्त करने का सामर्थ्य रखता है।
​दीपावली एवं पूजन का शास्त्रसम्मत महत्व
​शास्त्रों के अनुसार दीपावली के दिन मां महालक्ष्मी, विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश, ज्ञान की देवी मां सरस्वती एवं धन के अधिपति कुबेर की आराधना की जाती है। इस पूजन में प्रदोष काल और स्थिर लग्न (विशेषकर वृषभ लग्न) का अत्यधिक महत्व माना गया है। धर्मशास्त्रों का विधान है कि स्थिर लग्न में किया गया लक्ष्मी पूजन घर-परिवार में ऐश्वर्य, शांति, आरोग्य और समृद्धि को स्थायी रूप प्रदान करता है।
​दीपावली की तिथि एवं प्रदोष व्यापिनी अमावस्या के आधार पर पूजन के मुख्य कालखंड इस प्रकार फलदायी माने गए हैं:
​प्रदोष काल मुहूर्त (गृहस्थ पूजन हेतु सर्वोत्तम):
संध्याकाल के समय जब सूर्यास्त के उपरांत प्रदोष काल रहता है, उस समय स्थिर लग्न में महालक्ष्मी का आह्वान, दीप प्रज्वलन और श्रीसूक्त/कनकधारा स्तोत्र का पाठ विशेष फलदायी होता है। यह मुहूर्त पारिवारिक सुख-शांति और ऐश्वर्य की वृद्धि के लिए श्रेष्ठ है।
​निशीथ काल एवं महानिशीथ काल (व्यापारी एवं तंत्र/साधना हेतु):
मध्यरात्रि का समय महानिशीथ काल कहलाता है। इस काल में सिंह लग्न की उपस्थिति को शास्त्रों में विशेष तंत्रोक्त साधना, मंत्र सिद्धि, व्यापारिक खाता-बही पूजन और स्थायी लक्ष्मी प्राप्ति के लिए अत्यंत शुभ माना गया है।
​देवभूमि की चेतना और अंतर्मन का दीप
​देवभूमि उत्तराखण्ड की पावन परंपरा हमें सिखाती है कि बाह्य दीप प्रज्वलन के साथ-साथ अपने भीतर के सद्गुणों को भी जाग्रत किया जाए। दीप का असली उद्देश्य केवल अंधकार को दूर करना ही नहीं, बल्कि दूसरों के मार्ग को आलोकित करना भी है। यदि हम अपने आस-पास के किसी विपन्न व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान ला सकें, समाज में सकारात्मकता फैला सकें और पर्यावरण का संरक्षण करते हुए सौहार्द का वातावरण निर्मित कर सकें, तभी इस महापर्व की वास्तविक सार्थकता है।
​यह पावन पर्व समस्त जनमानस के जीवन में उत्तम स्वास्थ्य, मंगलकारी ऊर्जा और स्थायी समृद्धि लेकर आए। मां महालक्ष्मी और भगवान श्री गणेश की कृपा से हर घर-आंगन ज्ञान और प्रेम के प्रकाश से आलोकित रहे।
​— अखिलेश चन्द्र चमोला
देवभूमि उत्तराखण्ड

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