पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी का ऋषि चिंतन

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🌴२० अगस्त २०२६ गुरुवार 🌴
श्रावण शुक्लपक्ष अष्टमी २०८३
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‼️ऋषि चिंतन ‼️
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❗➖‼️उपवास‼️➖❗
आंतरिक अंगों की सफाई की प्रक्रिया
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👉 जिस प्रकार हम स्नान करके साबुन लगाकर, तौलिए से घिसकर शरीर के बाहरी भाग की सफाई कर डालते हैं, उसी प्रकार भीतरी अंगों की सफाई रहना भी परमावश्यक है। सच पूछा जाए तो गंदगी हमारे शरीर के भीतर ही इकट्ठी रहती है और उसी का एक अंश पसीने तथा मैल के रूप में बाहर निकलता है, पर भीतर की सफाई कैसे हो यह सब लोग नहीं जानते। यों तो कहने के लिए हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने उद्देश्य की पूर्ति के लिए धौति, वस्ति, नेती, नौलिक, त्राटक और कपालभाति आदि हठयोग के षट्कर्मों का आविष्कार किया था, जिससे प्रत्येक भीतरी अंश को धोकर उसी प्रकार स्वच्छ कर लिया जाता है, जैसे हम शरीर के ऊपरी भाग को धोते हैं। पर ये विधियाँ योगियों द्वारा की जाती हैं, साधारण मनुष्यों के लिए सुविधाजनक नहीं मानी जातीं। यह भी संभव है कि अधिकांश व्यक्ति उनको ठीक ढंग से न कर सकें और लाभ के स्थान पर कुछ हानि उठा लें।
👉 इसलिए साधारण मनुष्यों के लिए भीतरी अंगों की सफाई का दूसरा तरीका निकाला गया है और वह है-“उपवास।” वास्तव में हमारे शारीरिक यंत्र का निर्माण परमात्मा ने ऐसे ढंग से किया है कि अगर उसे स्वाभाविक ढंग से रखा जाए और प्रकृति के अनुकूल आचरण करने दिया जाए तो वह स्वयं अपनी भीतरी अंगों की सफाई कर सकता है। पर वर्तमान समय में मनुष्य ने प्रकृति के आदेश को मानना छोड़कर कृत्रिम ढंगों से रहना आरंभकर दिया है। उसका आहार-विहार अधिकांश में अस्वाभाविक हो गया है। इसलिए शरीरों में दूषित विकारों का अंश बढ़ जाता है। हमारी प्राणशक्ति इस विकार को हानिकारक समझकर बाहर निकालना चाहती है, पर हम नित्य प्रति दो-दो, चार-चार बार भोजन करके उस पर बोझा पर बोझा लादते चले जाते हैं। इससे विवश होकर वह निष्क्रिय हो जाती है। “उपवास” करने से जब पेट खाली हो जाता है और पचाने के लिए शक्ति की आवश्यकता नहीं होती, तब वही शक्ति शारीरिक विकारों को बाहर निकालकर भीतरी अंगों की सफाई का कार्य करने लगती है। इसीलिए शरीरशास्त्रवेत्ताओं ने कहा है कि यदि आप स्वास्थ्य, यौवन, जीवन का आनंद, स्वतंत्रता या शक्ति चाहते हैं तो “उपवास” कीजिए। आपको सौंदर्य, विश्वास, हिम्मत, गौरव सरीखी निधियाँ प्राप्त करने के लिए भी उपवास करना चाहिए। “उपवास” से मनुष्य की “नैतिक” और “आध्यात्मिक” उन्नति होती है, उसकी नैसर्गिक बुद्धि जगती है और वह प्रेम की विशालता का अनुभव कर पाता है।
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“पवित्र जीवन”- Code GP-12पृष्ठ ०९
🍁।।पं श्रीराम शर्मा आचार्य।।🍁
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