जनसंख्या परिसीमन का विरोध करेंगे राज्य आंदोलनकारी ललित कांडपाल

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उत्तराखंड राज्य का गठन केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए नहीं, बल्कि विशेष रूप से पहाड़ी क्षेत्रों के संतुलित विकास, सांस्कृतिक संरक्षण एवं भौगोलिक विषमताओं को ध्यान में रखते हुए किया गया था। वर्ष 1993–94 के ऐतिहासिक राज्य आंदोलन ने यह स्पष्ट किया था कि पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याएँ मैदानी क्षेत्रों से भिन्न हैं, और इनके समाधान हेतु अलग राज्य आवश्यक है।
आज प्रस्तावित जनसंख्या आधारित परिसीमन इस मूल भावना के विपरीत प्रतीत होता है। यदि केवल जनसंख्या को ही आधार बनाकर संसदीय एवं विधानसभा सीटों का निर्धारण किया जाएगा, तो उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों का प्रतिनिधित्व स्वतः कमजोर हो जाएगा। इससे न केवल पर्वतीय क्षेत्रों की आवाज दबेगी, बल्कि राज्य निर्माण का मूल उद्देश्य भी अप्रासंगिक हो जाएगा।
यह अत्यंत चिंताजनक है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण के प्रति जागरूकता दिखाई और संतुलित विकास की दिशा में प्रयास किए, उन्हें इस प्रक्रिया में नुकसान उठाना पड़ सकता है; जबकि अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को इसका लाभ मिलना संभावित है। यह स्थिति न्यायसंगत नहीं कही जा सकती।
अतः यह आवश्यक है कि परिसीमन की प्रक्रिया में केवल जनसंख्या को ही नहीं, बल्कि भौगोलिक परिस्थितियों, क्षेत्रीय विषमताओं, दुर्गमता, सीमांत क्षेत्रों की संवेदनशीलता एवं विकास की आवश्यकता जैसे कारकों को भी समान महत्व दिया जाए। विशेष रूप से उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों के लिए भौगोलिक आधार को प्राथमिकता देना समय की मांग है। यदि इस विषय पर समुचित विचार नहीं किया गया, तो उत्तराखंड की जनता को पुनः अपने अधिकारों एवं अस्तित्व की रक्षा हेतु व्यापक जनआंदोलन का मार्ग अपनाना पड़ सकता है, जैसा कि राज्य निर्माण के समय 1993–94 में देखा गया था।
उत्तराखंड के जनप्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों एवं समस्त नागरिकों से अपील है कि वे इस महत्वपूर्ण विषय पर एकजुट होकर अपनी आवाज बुलंद करें, ताकि राज्य के हितों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके।

ललित काण्डपाल
उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी

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