क्यों मनाई जाती है नाग पंचमी जानिए ज्योतिषाचार्य डॉ मंजू जोशी से

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नाग पंचमी2026: सनातन चेतना, कुण्डलिनी जागरण एवं प्रकृति-संरक्षण का महापर्व

सर्वेभ्यो नमो नमः!
नाग पंचमी के पावन पर्व पर समस्त सनातन-धर्मी पाठकों, ऋषितुल्य धर्मावलंबियों एवं शिव-भक्तों को सप्रेम प्रणाम व हार्दिक शुभकामनाएं।
अवगत करना चाहूंगी दिनांक 17 अगस्त 2026 दिन सोमवार को नाग पंचमी पर्व मनाया जाएगा।

नाग पंचमी क्यों मनाई जाती है?
नाग पंचमी का यह पावन पर्व श्रावण मास की पंचमी तिथि को नाग देवों की कृपा प्राप्त करने, प्रकृति-संतुलन बनाए रखने तथा सर्प-भय से मुक्ति हेतु मनाया जाता है। महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत के आदि पर्व तथा भविष्य पुराण (ब्राह्म पर्व) के अनुसार, राजा परीक्षित की तक्षक नाग के दंश से हुई मृत्यु का प्रतिशोध लेने हेतु उनके पुत्र राजा जनमेजय ने अति उग्र ‘सर्प सत्र महायज्ञ’ का आयोजन किया था। इस यज्ञ की अग्नि में संसार के समस्त नाग भस्म होने लगे थे। तब नागों की जननी देवी मनसा तथा महर्षि जरत्कारु के परम तेजस्वी पुत्र आस्तिक मुनि ने अपने अगाध तपोबल, ज्ञान और शास्त्र-सम्मत तर्कों से राजा जनमेजय को प्रसन्न कर उस विनाशकारी यज्ञ को स्थगित करवाया और समस्त नागवंश की रक्षा की। जिस पावन तिथि को नागों को अभयदान प्राप्त हुआ, वह श्रावण शुक्ल पंचमी ही थी। तभी से नागों के प्रति कृतज्ञता एवं अभय की प्राप्ति हेतु नाग पंचमी का महापर्व मनाया जाता है।

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सनातन संस्कृति केवल मानव-कल्याण तक सीमित नहीं है, अपितु समस्त प्रकृति एवं उसके प्रत्येक जीव में ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ (सब कुछ ब्रह्म ही है) का दर्शन कराती है। इसी अद्वैत परंपरा का प्रतीक है नाग पंचमी का महापर्व, जो श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को पूरे भारतवर्ष में अपार श्रद्धा और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया जाता है।
स्कंद पुराण (नागर खंड) एवं भविष्य पुराण (ब्राह्म पर्व) के अनुसार, इस सिद्ध तिथि पर नाग देवों की विधि-विधान से उपासना करने से साधक को अभय का वरदान प्राप्त होता है, मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा जन्मांतर के संचित पापों एवं भयों का नाश होता है।

नाग उपासना हेतु सिद्ध नवनाग स्तोत्र
शास्त्रों के अनुसार नाग पंचमी के दिन नव-नागों का स्मरण करने से प्राणी को सर्प-भय, विष-भय और अनिष्ट ग्रहों के कोप से मुक्ति मिलती है:

अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्।
शङ्खपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा॥
एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्।
सायङ्काले पठेन्नित्यं प्रातःकाले विशेषतः।
तस्य विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्॥

नागों का त्रिदिशीय स्वरूप:– पौराणिक, आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक

पौराणिक एवं आध्यात्मिक प्रतीक

शिव का भूषण:
देवाधिदेव महादेव अपने कंठ में ‘वासुकि नाग’ को धारण कर यह संदेश देते हैं कि विषम से विषम परिस्थिति को भी प्रेम, करुणा और वैराग्य से वश में किया जा सकता है।

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विष्णु की शय्या:
जगदाधार भगवान श्री हरि विष्णु ‘अनंत शेषनाग’ की शय्या पर क्षीरसागर में विराजमान हैं, जो यह सिखाता है कि संसार की चंचल परिस्थितियों के बीच भी अंतःकरण को शांत, अच्युत और स्थिर कैसे रखा जाए।

समुद्र-मंथन में योगदान– मंदराचल पर्वत को मथने हेतु वासुकि नाग का स्वयं रज्जु (रस्सी) बनना परम त्याग और जन-कल्याण हेतु समर्पण का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है।

योगिक स्वरूप(कुण्डलिनी शक्ति का प्रतीक)
योग-शास्त्र एवं तंत्र-विद्या में मानव शरीर के भीतर स्थित सुप्त कुण्डलिनी शक्ति को मूलाधार चक्र में सार्ध-त्रि वलय (साढ़े तीन लपेटे) मारे सर्प के रूप में वर्णित किया गया है। नाग पंचमी की तिथि साधना, ध्यान, प्राणायम एवं आत्म-ऊर्जा के उर्ध्वगमन (जागरण) के लिए अत्यंत सिद्ध मानी जाती है।

वैज्ञानिक एवं पर्यावरणीय आधार
क्षेत्रपाल भूमिका: कृषि-प्रधान संस्कृति में सर्प फसलों को नष्ट करने वाले कीट-पतंगों व मूषकों का भक्षण कर अन्न भंडार की रक्षा करते हैं, इसीलिए इन्हें ‘क्षेत्रपाल’ कहा गया है।

प्रकृति संतुलन: मानसून में जलभराव के कारण सर्प भू-गर्भीय बिलों से बाहर आते हैं; यह पर्व प्राणी-मात्र के प्रति अहिंसा तथा आहार-श्रृंखला के संतुलन का सनातन संदेश देता है।

मृदा संरक्षण:
सर्पों द्वारा बनाए गए भूमिगत सुरंगों के माध्यम से वर्षा जल भू-गर्भ में गहराई तक पहुँचता है, जिससे जल-स्तर संवर्धित होता है और मृदा स्वास्थ्य उत्तम बना रहता हैं।

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ज्योतिषीय प्रभाव एवं दोष-निवारण के अचूक उपाय
किन्हें करने चाहिए उपाय?

जिसकी कुंडली में कालसर्प दोष, सर्प दोष, विष दोष या गुरु चांडाल दोष हो।
जो जातक राहु या केतु की महादशा, अंतर्दशा या प्रत्यंतर्दशा से प्रभावित हों।
जिन्हें स्वप्न में सर्प दिखाई देते हों अथवा मानसिक अशांति व अज्ञात भय रहता हो।

दोष-निवारण के उपाय:
नाग पंचमी पर शिव मंदिर में कालसर्प दोष अथवा सर्प दोष शांति पूजन कराएं।

शिवार्चन व रुद्राभिषेक: शिवजी व नाग देव का कच्चे दूध व गंगाजल से रुद्राभिषेक कर बेलपत्र व शमी पत्र अर्पित करें।
रजत(चांदी) नाग-नागिन प्रवाह: चांदी के नाग-नागिन के जोड़े का पूजन कर उन्हें पवित्र नदी में प्रवाहित करें।

मंत्र जप: नाग-गायत्री मंत्र
(ॐ नवकुलाय विद्महे विषदन्ताय धीमहि तन्नो सर्पः प्रचोदयात्॥) का 108 बार जप करें।
दान-पुण्य– राहु-केतु की शांति के लिए जरूरतमंदों को काले तिल, उड़द, वस्त्र तथा सप्तधान्य दान करें।

नाग पंचमी का पर्व हमें यह विराट संदेश देता है कि जो जीव भयंकर अथवा विषैले प्रतीत होते हैं, उनके प्रति भी करुणा, समभाव एवं पूज्य-भाव रखना ही सनातन धर्म की उदारता है।

नाग देवता आप सभी के जीवन से भय, रोग तथा दोषों का निवारण कर सुख, समृद्धि एवं आरोग्य प्रदान करें।

ज्योतिषाचार्य डॉ. मंजू जोशी
वैदिक ज्योतिष एवं वास्तु विशेषज्ञ
8395806256

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