पालीथीन उन्मूलन की दिशा में पर्यावरणविद् डॉक्टर आशुतोष पंत को मिली बड़ी कामयाबी

ख़बर शेयर करें

पॉलीथिन उन्मूलन की दिशा में एक बड़ी उम्मीद जगी है प्रमुख पर्यावरणविद् तथा पूर्व जिला आयुर्वेदिक चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर आशुतोष पंत द्वारा हाई कोर्ट में दायर जनहित याचिका के तहत इस पर एक्शन शुरू हुआ है जानकारी देते हुए पर्यावरण विद डॉक्टर आशुतोष पंत ने बताया कि

*मुख्य सचिव ने हाईकोर्ट के आदेश पर पॉलीथीन नियंत्रण के लिये सचिवों के साथ मीटिंग की। उन्होंने बताया कि
मेरे द्वारा दायर जनहित याचिका WPPIL संख्या 82/2026 पर कल 24 जुलाई को माननीय उच्च न्यायालय नैनीताल में सुनवाई हुई थी। मेरे अधिवक्ता श्री पूरन सिंह रावत ने पक्ष रखा।
कोर्ट ने भारत सरकार सहित सभी 5 विपक्षियों को नोटिस जारी करते हुए 10 सितंबर को अगली सुनवाई की तारीख तय की।
मैंने स्वंय भी अपना पक्ष रखते हुए कोर्ट से विषय की गंभीरता को समझते हुए तात्कालिक कार्यवाही के लिये कुछ आदेश करने की प्रार्थना की।
न्यायमूर्ति श्री मनोज तिवारी जी और श्री पंकज पुरोहित जी की बेंच ने मुझसे एक हफ्ते के भीतर उत्तराखंड के मुख्य सचिव के समक्ष पॉलीथीन प्रदूषण नियंत्रण के बारे में अपने सुझाव रखने के निर्देश दिए थे । इसके साथ ही कोर्ट ने मुख्य सचिव से इन सुझावों पर एक समिति बनाकर शीघ्र कार्यवाही करने के निर्देश दिये थे।
26 जुलाई के पत्र द्वारा मैंने मुख्य सचिव को सुझाव दिए।
इस संबंध में कार्यवाही के लिये 18 अगस्त को मुख्य सचिव द्वारा सचिवालय में एक बैठक आहूत की गई जिसमें
उत्तराखंड शासन के 14 विभागों के सचिवों को बुलाया गया।
मेरी मांग है कि सिंगल यूज़ प्लास्टिक के निर्माण और प्रयोग पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जाय। जब तक निर्माण बंद नहीं होगा तब तक बाजार में पॉलीथीन आती रहेगी। अगर हमें प्लास्टिक कचरा रोकना है तो स्रोत को बंद करना होगा।
आज स्थिति यह है कि हर गांव, शहर, कस्बों में जगह जगह कूड़े के ढेर लगे हुए हैं। जरा सी बारिश होती है तो सड़कें जलमग्न हो जाती हैं, लोगों के घरों में पानी भर जाता है। आज से 25/30 साल पहले जब पॉलीथीन प्रचलन में नहीं थी तब ऐसी गम्भीर स्थिति कभी नहीं रही। अतिवृष्टि होने पर नदियों में बाढ़ जरूर आती थी, तटीय इलाके प्रभावित होते थे पर हर जगह जल भराव जैसे आज के समय होता है तब नहीं होता था।
अफसोस की बात यह है कि आज माइक्रोप्लास्टिक भूजल में पहुंच गया है, समुद्र की सबसे गहरी जगह में पाया गया है। यहां तक कि ग्लेशियरों में भी पहुंच गया है। स्तनपान कराने वाली माओं के दूध तक में माइक्रोप्लास्टिक का मिलना बहुत ही दुर्भायपूर्ण स्थिति है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि भारत में हर पांचवे आदमी के रक्त में माइक्रोप्लास्टिक पहुंच चुकी है। कैंसर के मामलों में बढ़ोत्तरी का एक बड़ा कारण माइक्रोप्लाटिक भी है। अब भी अंकुश नहीं लगाया गया तो आने वाले समय में कोई भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं रहेगा।
अफसोस यह है कि लोग पढ़े लिखे होकर भी नादानी करते हैं इधर उधर पॉलीथीन में रखकर कूड़ा फेंक देते हैं। गंगोत्री, यमुनोत्री जैसे पर्वतीय धाम, बुग्याल भी प्लास्टिक और कूड़े से पटे पड़े हैं वहां के वीडियो देखकर मन विचलित हो जाता है।
लोग सड़कों के किनारे भंडारा करते हैं, शरबत पिलाते हैं और कूड़ा सड़कों पर फैला रह जाता है।
शासन प्रशासन को कूड़ा फैलाने वालों पर सख्त कार्यवाही करनी चाहिए़ पर ये हालात केवल नियम बनाकर ही सुधरने वाले नहीं है। लोगों को खुद भी जागरूक होना होगा और दूसरों को भी जगाना होगा।
मुख्य सचिव द्वारा बैठक बुलाए जाने से उम्मीद बंधी है कि अब शायद पॉलीथीन पर रोक के लिये सरकारी स्तर पर कुछ प्रभावी कार्यवाही होगी