युग ऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी का आज का सदचिंतन

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🌴।।१९ अगस्त २०२६ बुधवार ।।🌴
।।श्रावण शुक्लपक्ष सप्तमी २०८३।।
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‼️ऋषि चिंतन ‼️
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पवित्रता एक आध्यात्मिक गुण
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👉 “वस नित्यं पवित्रः सन् बाह्याभ्यन्तरतस्तथा । यतः पवित्रतायां हि राजतेऽतिप्रसन्नता ॥

अर्थात “मनुष्य को बाहर और भीतर से पवित्र रहना चाहिए क्योंकि पवित्रता में ही प्रसन्नता रहती है।”
👉 पवित्रता में चित्त की प्रसन्नता, शीतलता, शांति, निश्चितता, प्रतिष्ठा और सचाई छिपी रहती है। कूड़ा-करकट, मैल-विकार, पाप, गंदगी, दुर्गंध, सड़न, अव्यवस्था और घिचपिच से मनुष्य की आंतरिक निकृष्टता प्रकट होती है।
👉 आलस्य और दरिद्र, पाप और पतन जहाँ रहते हैं, वहीं मलिनता या गंदगी का निवास रहता है। जो ऐसी प्रकृति के हैं, उनके वस्त्र, घर, सामान, शरीर, मन, व्यवहार, वचन, लेन-देन सबमें गंदगी और अव्यवस्था भरी रहती है। इसके विपरीत जहाँ चैतन्यता, जागरूकता, सुरुचि, सात्विकता होगी, वहाँ सबसे पहले स्वच्छता की ओर ध्यान जाएगा। सफाई, सादगी और सुव्यवस्था में ही सौंदर्य है, इसी को पवित्रता कहते हैं।
👉 गंदे खाद से गुलाब के सुंदर फूल पैदा होते हैं, जिसे मलिनता को साफ करने में हिचक न होगी, वही सौंदर्य का सच्चा उपासक कहा जाएगा। मलिनता से घृणा होनी चाहिए, पर उसे हटाने या दूर करने में तत्परता होनी चाहिए। आलसी अथवा गंदगी की आदत वाले प्रायः फुरसत न मिलने का बहाना करके अपनी कुरुचि पर परदा डाला करते हैं।
👉 “पवित्रता” एक आध्यात्मिक गुण है। आत्मा स्वभावतः पवित्र और सुंदर है, इसलिए आत्मपरायण व्यक्ति के विचार, व्यवहार तथा वस्तुएँ भी सदा स्वच्छ एवं सुंदर रहते हैं। गंदगी उसे किसी भी रूप में नहीं सुहाती, गंदे वातावरण में उसकी साँस घुटती है, इसलिए वह सफाई के लिए दूसरों का आसरा नहीं टटोलता, अपनी समस्त वस्तुओं को स्वच्छ बनाने के लिए वह सबसे पहले अवकाश निकालता है।
👉 पवित्रता के कई भेद हैं। सबसे पहले शारीरिक स्वच्छता का नंबर आता है, जिसमें वस्त्रों और निवास स्थान की सफाई भी आवश्यक होती है। दूसरी स्वच्छता “मानसिक विचारों” और भावों की होती है। आर्थिक मामलों में भी, जैसे आजीविका, लेन-देन आदि में शुद्ध व्यवहार करना श्रेष्ठ गुण समझा जाता है। चौथी पवित्रता व्यावहारिक विषयों की है, जिनका आशय बातचीत और कार्यों के औचित्य से है। अंतिम नंबर “आध्यात्मिक विषयों की पवित्रता” का है, जिसके बिना हमारा धर्म-कर्म निरर्थक हो जाता है। इन सबमें शारीरिक और मानसिक पवित्रता से लोगों का विशेष काम पड़ा करता है, क्योंकि इनके होने से अन्य विषयों में स्वयं ही पवित्र भावों का उदय होता है।
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“पवित्र जीवन” – Code GP-12 पृष्ठ ०१
🍁।।पं श्रीराम शर्मा आचार्य।।🍁
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